Saturday, July 2, 2011

हेम पाण्डेय की हत्या से उठे सवाल

और हेम पाण्डेय की भी हत्या कर दी गई। सरकारी बयान को देखें तो आन्ध्रप्रदेश की पुलिस ने माओवादी नेता चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद के साथ हेमचन्द्र पाण्डेय को मुठभेड़ में मार गिराया। हेम पाण्डेय की पत्नी बबीता के अनुसार हेम डीएआरसीएल नाम की एक कम्पनी के नियमित कर्मचारी थे। वे वहां कारपोरेट कम्युनिकेशन विभाग में ‘‘चेतना’’ नामक पत्रिका का सम्पादन करते थे। इसके अलावे वे कई अखबारों में नियमित स्वतंत्र रूप से लिखा करते थे। कुछ अखबार के सम्पादकों ने तो हेम पाण्डेय का नाम सी.पी.आई. (माओवादी) पार्टी से जुड़ने के बाद अपने अखबार को यह कहकर किनारे कर लिया कि हेम ने उनके अखबार में कभी नहीं लिखा। बबीता ने जब हेम के कई प्रकाशित लेख सार्वजनिक किये तब जाकर अखबारों का मुंह बन्द हुआ। यह इत्तेफाक ही है कि जिस दिन हेम की हत्या हुई उसी दिन राष्ट्रीय सहारा में उनका लेख ‘‘गरीब मुल्कों में जमीन की लूट’’ सम्पादकीय पृष्ठ पर छपा था।
हेम की हत्या की खबर सुनकर देश के कई जनवादी-समाजवादी पत्रकारों में आक्रोश फैल गया। सबके जुबान पर यही सवाल था कि आज एक पत्रकार को माओवादी बताकर फर्जी मुठभेड़ में गया है, कल किसी भी पत्रकार के साथ ऐसा हो सकता है। हेम पाण्डेय के पत्रकार होने की और उनकी हत्या की बात सुनकर हैदराबाद के पत्रकार संगठन ने भी विरोध प्रदर्शन किया। वहां के पत्रकारों ने पहल कर हेम के शव को दिल्ली भिजवाने की व्यवस्था की तथा राज्य के गृहमंत्री से मिलकर इस फर्जी मुठभेड़ के न्यायिक जांच की भी मांग की।
हेम की हत्या 1-2 जुलाई की रात आन्ध्रप्रदेश के सम्भवतः आदिलाबाद में की गई थी। दरअसल सी.पी.आई. (माओवादी) पार्टी के प्रवक्ता आजाद के साथ मारे गए दूसरे शख्स के रूप में हेम की थे। शुरू में स्थिति भ्रम की बनी लेकिन दूसरे दिन जब अखबार में छपी फोटो को देखकर दिल्ली में हेम की पत्नी ने जब इस दूसरे शख्स की पहचान अपने पति हेम चन्द्र पाण्डेय के रूप में की तब स्थिति साफ हो पाई लेकिन तब तक तो काफी देर हो चुकी थी। हेम मुठभेड़ में मार दिये गए थे। बाद में बबीता ने प्रेस कान्फ्रेस कर बताया कि उनके पति आपरेशन ‘‘गीन हन्ट’’ पर स्टोरी करने 30 जून की शाम दिल्ली से नागपुर के लिये रवाना हुए थे।
7 जुलाई की रात बबीता और हेम के भाई राजीव पाण्डेय हेम का शव लेकर दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में स्वामी अग्निवेश के आफिस 7, जन्तर मन्तर के बाहर शव को रखा गया। वहां अनेक पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक जुट होकर हेम पाण्डेय को श्रंद्धाजलि अर्पित की। इसमें डा. बी.डी. शर्मा अरूंधति राय, सुमित चक्रवती, मंगलेश डबराल, नीलभ, आनन्द स्वरूप वर्मा, पंकज विष्ट, जावेद नकवी, अनिल चमड़िया, उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के सुरेश नौटियाल, फिल्मकार संजय काक, भाकपा माले की राधिका मेनन, आइसा के महासचिव रवि राय, प्रो. अनिल भदुड़ी, काम्बैंट लॉ के सम्पादक हर्ष डोभाल, पीपुलस मार्च के सम्पादक गोविन्दन कुट्टी, आन्ध्रप्रदेश इलेक्ट्रानिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन के जलील, हैदराबाद ले आए मानवाधिकार कार्यकर्ता रघुनाथ सहित अनेक पत्रकारों, बुधिजीवियों ने होम का अन्तिम दर्शन किया और श्रंद्धाजलि दी। यहां उपस्थित सभी लोगों ने ‘‘फर्जी मुठभेड़’’ की न्यायिक जांच की मांग की। बाद में दिल्ली के निगम बोध घाट पर हेम को अन्तिम बिदाई दी गई।
विडम्बना देखिये कि हेम के परिवार वालों ने हेम का शव अध्ययन और प्रयोग के लिये अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान को देने की पेशकश की लेकिन संस्थान ने शव को लेने से मना कर दिया।
हेम अपने छात्रजीवन से ही उत्तराखण्ड के छात्र आन्दोलन में सक्रिय थे। उनका छात्र जीवन पढ़ाई के साथ छात्र संगठन, आइसा, और प्रगतिशील छात्र मंच की राजनीति में बीता। पत्र-पत्रिकाओं में लेखन वे इसी दौर में शुरू कर चुके थे। हेम ने कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोढ़ा कैम्पस के अर्थशास्त्र विभाग में पी.एच.डी. में दाखिला लिया था। पी.एच.डी. को अधूरा छोड़कर वे दिल्ली आ गए तथा यहीं भारतीय विद्या भवन से उन्होंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया। धिरे धिरे के प्रमुख राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखने लगे। भारतीय विद्या भवन के उनके पूर्व सहवाठियों ने भी हेम की हत्या को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
इसमें सन्देह नहीं कि हेम पाण्डेय की विचार धारा वामपंथी थी। वे जन महत्व के विभिन्न मुद्दे पर कलम चलाते थे। आप कह सकते हैं कि हेम वामपंथी रूझान के पत्रकार थे। उनके लेखों में आम आदमी के जीवन का दर्द और अपनी जमीन से बेदखल किये जा रहे लोगों का संघर्ष दिखता था। चूंकि हेम की विचारधारा वामपंथी थी इसीलिये हेम को माओवादी बताकर पुलिस-सरकार द्वारा मार दिया जाना निश्चित ही शर्मनाक घटना है। इसलिये राजधानी और देश के पत्रकारों के सगंठनों के अलावे अर्न्तराष्ट्रीय पत्रकार एवं मानवाधिकार संगठन ने भी इस कथित मुठभेड़ के निष्पक्ष और न्यायिक जांच की मांग उठाई है। दिल्ली के प्रगतिशील पत्रकारों ने एक सामुदायिक निर्णय में यह तय किया है कि हेम के शहादत दिवस पर हर साल एक व्याख्यान माला आयोजित की जाएगी और हेम को आमजनों की स्मृतियों में याद रखा जाएगा।
क्रोध चीख और गुस्से को भले ही सम्मानजनक न माना जाए पर दुनिया की 7 अरब से ज्यादा आबादी इसी भाषा में बोलती है। भय और असुरक्षा से ग्रस्त भारत के 10 करोड़ आदिवासी भले ही गंूगे भी हों तो भी इसी भाषा में बोलते हैं। छत्तीसगढ़ हो या झारखंड, उड़ीसा हो या पश्चिम बंगाल देश के ये मूल निवासी जब अपनी पीड़ा अपनी भाषा में व्यक्त करते हैं तो भद्र समाज तिलमिला जाता है। आदिवासियों की यह भाषा या प्रतिक्रिया शहर में बैठे मध्यम वर्ग एवं सभ्य समाज को नहीं सुहाती। सरकार इसे आंतकवाद या माओवाद कहती है। जब व्यक्ति या समाज को उसके जडत्र से काटने की कोशिश की जाती है तो उस व्यक्ति या समूह द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया, विद्रोह या हिंसा कही जाती है। सरकार की नजर में यह आतंकवाद है, देश द्रोह है।
आजादी के दौर में हिंसा-अहिंसा का सवाल मुखर था। तमाम जद्दो जहद के बाद अंिहसा एक सत्याग्रह के अस्त्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। अंग्रेज इस हथियार से डरने लगे थे। फिर जो हुआ सबके सामने है। लेकिन आजादी के बाद अहिंसा का यह हथियार कुंद होने लगा। शान्तिपूर्ण आन्दोलनों और जन-प्रतिरोधों पर सरकारी जुल्म बढ़ने लगे। अहिंसक आन्दोलनों को बरबरतापूर्वक कुचला जाने लगा। अहिंसक प्रतिरोध की इन्तहा हो गई। मणिपुर की महिलाओं का नग्न प्रदर्शन, इरोम शर्मिला का लम्बा सत्याग्रह, आदिवासियों किसानों का प्रदर्शन, किसानों की आत्म हत्या सब अहिंसक आन्दोलन के ही रूप हैं लेकिन उसकी परिणति दुनिया देख रही है। अहिंसा की आड़ लेकर सरकारी पुलिसिया जुल्म बढ़ने लगे। फर्जी एन्काउन्टरों की बाढ़ आ गई। कई मामले लीपा पोती के बाद फाइलों और मध्यवर्ग की स्मृतियों से भी गुम हो गए। अहिंसा को प्रभावहीन माना जाने लगा। आजाद भारत के लोकतांत्रिक सरकार की यह सबसे बड़ी विफलता है।
वामपंथ ने दुनिया की राजनीति में एक अलग-अलग विकसित की। धीरे धीरे वामपंथ की भाषा, जीवन शैली और तौर-तरीके भी बदल गए। अतिवाद, संशोधनवाद आदि वामपंथ के आपसी अर्न्तविरोध से उपजे शब्द हैं। 1967 नक्सलवादी आन्दोलन का अहम पक्ष यह है कि वामपंथ दो धाराओं में विभाजित हो गया। एक चुनाव का रास्ता, दूसरा संघर्ष का। बाद में इस संघर्ष ने भी सशस्त्र संघर्ष का रूप ले लिया। बाद में वामपंथ के जितने भी धड़े बने सब आपस में विभाजित होते रहे और एक धारा से दूसरी धारा में आवागमन करते रहे। संसदीय चुनाव में जिन वामपंथी धड़ों ने सिरकत की और संसदीय रास्ते से देश में समाजवाद लाने का स्वप्न देखा उन्होंने गैर संसदीय वामपंथी और सशस्त्र संघर्ष में विश्वास करने वाले वामपंथी धड़े की अतिवादी घोषित कर दिया।
अतिवादी वामपंथी पूछते हैं कि संसद के रास्ते समाजवाद का सपना देखना क्या रोमांटिसिज्म नहीं है? खासकर इस दौर में जब संसदीय संरचना में पूंजी के केन्द्रीयकरण को रोज व रोज बढ़ावा मिल रहा है। सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है। विदेशी कम्पनियों के लिये देश के अहम सेवा क्षेत्र को मिलान किया जा रहा है। और तो और कम्पनियों के ठेकेदार संसद के लोक सभा राज्य सभा में घुस कर सरकार की कैबिनेट में जा बैठे हैं। अतिवादी कांग्रेस पूछते हैं- पूंजी केन्द्रीयकृत करने वाली संरचना में समाजवाद का स्वप्न देखना क्या रोमांटिसिज्म नहीं है?
पत्रकार हेम पाण्डेय की हत्या के बहाने माओवाद के विभिन्न पहलुओं पर यह चर्चा इसलिये जरूरी है कि अब देश में माओवाद के सफाए के नाम पर स्वतंत्र विचारधारा या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी कुचलने का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया गया है। श्री चिदम्बरम के गृह मंत्री बनने के बाद इस सरकारी ब्लू प्रिंट की रेखाएं स्पष्ट उभरने लगी हैं। अदिलाबाद में माओवादी नेता आजाद की हत्या के बाद पुलिस ने इसे अपनी बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित किया और आजाद के साथ मारे गए (सर मार दिये गए) दूसरे व्यक्ति को माओवादी सहदेव बताया लेकिन जब दूसरे दिन अखबार में फोटो छपी तो हेम की पत्नी बबीता और उनके परिजनों ने उसकी पहचान की। इसके बाद पुलिस ने हेम को माओवादी बताना शुरू कर दिया। पुलिस के साथ-साथ देश का मध्यवर्ग भी लगभग यही सोच रखता है सो कुद बुद्धिजीवी पत्रकारों ने भी देश से अपने को अलग कर लिया।
माओवादी नेता आजाद की हत्या पर भी थोड़ी चर्चा कर लें। पुलिस कहती है कि आजाद आन्ध्रप्रदेश के अदिलाबाद के पास जंगल में एक मुठभेड़ में मारे गए। माओवादी कहते हैं कि पुलिस ने उन्हें नागपुर से गिरफ्तार किया और आदिलाबाद के पास ले जाकर बर्बरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी और मुठभेड़ का नाम दे दिया। तथ्य बताते हैं कि आजाद शांतिवार्ता की पृष्ठ भूमि बनाने के लिये स्वामी अग्निवेश का पत्र लेकर केन्द्रीय समिति के अपने साथियों से विचार विमर्श करने के लिये दंडकारण्य में एक बैठक में जा रहे थे। उन्हें संघर्ष विराम की एक तारीख निश्चित करनी थी जिसे स्वामी अग्निवेश के माध्यम से गृहमंत्री पी. चिंदबरम तक पहुंचाना था। एक तरह से आजाद की हत्या कर सरकार ने विश्वासघात किया जो माओवादियों को ही प्रोत्साहित करेगा। जाने माने पत्रकार एवं वामपंथी चिंतक गौतम नवलखा इसे ‘‘दोहरी हत्या’’ करार देते हैं।
विगत कई दशकों से भारतीय राज्य सैन्यवादी नजरिये से काम कर रहा है। इसमें हिंसा की भूमिका भी प्रासंगिक है। लेकिन हिंसा की अपनी एक सीमा होती है। यह सीमा राजनीति से निर्धारित होती है। प्रतिरोध करना एक बात है। लेकिन वैकल्पिक राजनीति को सामने लाना दूसरी बात है। यह सही है कि विस्थापन का मुद्दा, खान के लिये जमीन हड़पने का मामला, उद्योग में लगे बड़े बड़े उद्योग घराने से सरकार व नेताओं की संवछता, जंगल, जल, जमीन पर अधिकार का मामला आदि ऐसे मसले हैं। जिसके समाधान की तत्काल उम्मीद तो नहीं दिखती। आखिर ऐसा क्यों है कि माओवादियों द्वारा की गई हिंसा के मुकाबले 10 लाख किसानों की आत्म हत्या पर ज्यादा शोर नहीं मचता।
कुछ सवाल माओवादियों से भी है। क्या माओवादी या क्रान्तिकारी वामपंथी कृषि क्षेत्र में आए पतन, उत्पादन बढ़ाने, विकास के नाम पर बेलगाम, पूंजी निवेश खनिज सम्पदा को लेकर हमारी नीति, गरीबी कम करने, अमीरी पर लगाने, राज्य को जिम्मेदार बनाने, आम जन के सशक्तिकरण, स्त्री समानता आदि के लिये उनके पास क्या वैकल्पिक नजरिया है। आखिर ऐसा क्यों है कि जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्व में दो दसक से चल रहे सैन्य दमन ने हमें इस बात के लिये प्रेरित नहीं किया कि हम राज्य की प्रकृति और उसकी भूमिका पर विचार करें जो शांतिपूर्ण आन्दोलनों का दमन करता रहा है। क्या भारतीय राज्य हिंसा के सहारे शान्तिपूर्ण आन्दोलनों को कुचल कर निरकंुश सत्ता का केन्द्र बना रहना चाहता है।
भारत सरकार में सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी रहे डा. ब्रह्मदेव शर्मा कहते हैं-चींटी पर यदि पांव रखोगे तो क्या वह छटपटाए या डंक भी न मारे। आखिर आत्मरक्षा का अधिकार तो आपका आई.पी.सी/सी.आर.पी.सी कानून भी देता है। आज आदिवासी अपने संसाधनों की लूट के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। जब आप शान्तिपूर्ण संघर्ष को कुचलने की कोशिश करेंगे तो वे भी प्रतिक्रिया करेंगे और यह हर जीव का नैसर्गिक अधिकार है। एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि हिंसा के साधनों पर जब तक राज्य का एकाधिकार बना रहेगा और राज्य एकतरफा हिंसा व शस्त्रों के बलबूते जनका का दमन करती रहेगी तो जन विद्रोह भी खड़े होंगे और उसे रोक पाना सम्भव न होगा।
हेम पाण्डेय बेहद कम समय में जनपक्षीय पत्रकारिता के पैरोकार के रूप में उभर रहे हैं। मैंने भी उनके एक-दो प्रकाशित लेख पढ़े हैं। उसमें वंचित समुदाय आदिवासियों व उनके हक के लिये विभिन्न मुद्दों पर रिर्पोट व फीचर नुमा उनके लेख हैं। कहीं से भी मुझे हेम पाण्डेय के लेख में माओवाद या आंतकवाद का गन्ध नहीं मिला। हां वे दबे जुबान को आवाज देने के काम में जरूर लगे थे। लेकिन अभी उनकी कलम परवान चढ़ती उसके पहले ही उसे खत्म कर दिया गया। हमें सोचना होगा कि हम लोकतंत्रा को निरंकुश राजसत्ता के हवाले ही गिरवी रहने देंगे या विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये संगठित संघर्ष करेंगे। हेम को श्रद्धांजलि देने की एक सार्थक परम्परा को भी स्थापित करना होगा।

Sunday, June 26, 2011

कैसे खत्म हो भ्रष्टाचार

डा. ए. के. अरुण
महत्वाकांक्षा व्यक्ति और उसके विकास के लिये जरूरी है लेकिन समाज कल्याण अथवा देष सेवा के नाम पर निजी महत्व को अहमियत देना अच्छे कार्य की श्रेणी में आएगा या नहीं इस पर पर लोग विचार करें लेकिन मेरी नजर में निजी महत्व के लिये समाज सेवा और देषभक्ति के भी उतने ही खतरे हैं, जितना भ्रष्टाचार के। भ्रष्टाचार उन्मूलन के नाम पर लोकतंत्र को दरकिनार करना तो और भी घातक है। पहले अन्ना बनाम सरकार और अब अन्ना बनाम बाबा का प्रहसन आम लोगों को न तो अटपटा लग रहा है और न ही अप्रत्याषित। इस लेख को लिखने से पहले मैंने देष के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे कुछ लेखक, चिन्तक मित्रों से उनकी प्रतिक्रिया जानी तो पता चला कि लोग अन्ना और बाबा के आन्दोलन में षुरू से ही फर्क देख रहे हैं। बाबा के पास पिछले दो-तीन वर्षों में बने लाखों लोगों की नगदी सदस्यता है तो अन्ना के पास उनके व्यक्तित्व, मीडिया प्रचार और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से जुड़े वे लोग जिसे मीडिया ने सिविल सोसाइटी का नाम दे दिया है।
अपने देष भारत के बारे में कहा जाता है कि यह विविधताओं से भरा एक लोकतंात्रिक देष है। इसकी अपनी कुछ विडम्बनाएं भी हैं। कहते हैं कि भारत में विचारधाराओं के इतने रंग हैं कि वह किसी भी मुद्दे पर कभी एक हो ही नहीं सकता। वैसे भी यहां लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यहां फासीवासद ज्यादा टिक नहीं सकता। यहां के लोग लोकतंत्र में थोड़ा भ्रष्टाचार तो सह सकते हैं लेकिन फासीवाद को कतई बरदाष्त नहीं कर सकते। इसलिये बाबा जब जब सेक्युलर दिखते हैं तो उनके साथ एक बड़ी जमात जुड़ती चली जाती है लेकिन जैसे ही उनके बोल और आचरण में साम्प्रदायिकता की बू आने लगती है तो कई लोग उनसे छिटकने भी लगते हैं। काले धन और भ्रष्टाचार से केवल बाबा रामदेव या अन्ना हजारे ही दुखी नहीं हैं बल्कि पूरा देष इस जहरीले दंष से त्रस्त है। इसीलिये जब भी भ्रष्टाचार मुद्दा बनता है तो पूरे देष से समर्थन के हाथ उठने लगते हैं और साथ में यह उम्मीद भी बढ़ने लगती है कि अन्ना हो या बाबा कोई तो इस देष को भ्रष्टाचार के कोढ़ से मुक्ति दिलाए।
अन्ना के अतीत और बाबा के वर्तमान दोनों पर कथित कड़े अनुषासन का असर देख जा सकता है। भ्रष्टाचारियों को ‘‘कड़ा दंड दो’’ एवं उसे ‘‘सरे आम फांसी’’ पर लटका दो जैसी गर्जना से हमारे दोनों भ्रष्टाचार विरोधी संत बड़े आक्रामक नजर आते हैं लेकिन भारत में यहां की सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता एवं अहिंसा के मूल्यों को आधार बना कर भारत में सामाजिक बुराईयों और गुलामी से लड़ने वाले हमारे पूर्व सन्तों के रास्ते को छोड़कर ये तालिबानी तौर-तरीकों से भ्रष्टाचार से लड़ने की अजीब स्थिति में फंस गए दिखाई देते हैं। षायद इसीलिये भ्रष्टाचार से लड़ते-लड़ते ये आपस में भी लड़ने लग जाते हैं।
अन्ना और बाबा के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से षुरु में सरकार आतंकित थी लेकिन अब सरकार के चेहरे चमकते नजर आ रहे हैं। जन लोकपाल विधेयक पर सहमति बनाने के लिये बनी समिति की 30 मई की बैठक के बाद जब सरकारी-गैर सरकारी दोनों पक्ष बाहर निकले तो कपिल सिब्बल तेजी से आगे चल रहे थे लेकिन जब मीडिया ने फोटो के लिये टोका तो उन्होंने अपनी चाल धीमी की और अन्ना के साथ हो लिये। वैसे भी अन्ना-बाबा विवाद के बाद कपिल सिब्बल के चेहरे ज्यादा खिले दिख रहे हैंए इसीलिये उन्होंने 30 जून की समय सीमा के बावजूद बीच में ही ब्रिटेन की यात्रा निर्धारित कर ली थी। हालांकि प्रधानमंत्री ने उनकी विदेष यात्रा निरस्त कर दी है। इधर बाबा पर भी अपना सत्याग्रह रोक देने का दबाव है लेकिन बाबा हर हाल में सत्याग्रह करने की घोषणा पर दृढ़ता से कायम हैं।
अन्ना-बाबा और सरकार के इस नूरा-कुष्ती में भ्रष्टाचार की पौ-बारह है। विगत 30 मई की बैठक में कई अहम मुद्दों पर जो मतभेद दिखे और उस पर बाबा ने जो मिर्ची लगाई उसके बाद तो आम लोगों में यह अन्देषा स्पष्ट घर कर गया है कि लोकपाल अब खटाई में पड़ता नजर आ रहा है। जन्तर मन्तर पर अन्ना के अनषन से जब सरकार की अंतड़ी सूखने लगी थी और आनन-फानन में सरकार ने सिविल सोसाईटी के ‘‘जन लोकपाल’’ को मान लेने का नाटक किया था तभी कई आन्दोलनकारी लोग इस पर आषंका व्यक्त करने लगे थे कि कभी न कभी सरकार ऐसा पच्चड़ फसाएगी कि लोकपाल की हवा निकल जाएगी। अब यह आषंका सच लगने लगी है। प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने का प्रस्ताव कोई नया नहीं है फिर भी मामला यहीं फंसा दिखता है। वास्तव में सरकार लोकपाल के पक्ष में ही नहीं है क्योंकि उनकी अपनी पुरानी जांच एजेन्सियाँ जैसे सी.बी.सी., सी.बी.आई. आदि का भला क्या औचित्य रह जाएगा?
आधुनिक मानव जीवन में भ्रष्टाचार पष्चिमी समाज की देन है। वर्षों पहले स्वीडन के जाने-माने अर्थषास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता गुन्नार मिर्डल ने एक किताब लिखी थी ‘‘एषियन ड्रामा’’। इसमें एक अध्याय भ्रष्टाचार पर था। इस पुस्तक में वे एषिया में फैले भ्रष्टाचार को यहाँ की परम्परा का हिस्सा बताते हैं लेकिन अपनी इसी पुस्तक में वे यह भी स्वीकार करते हैं कि योरोप के देषों में काफी पहले इस पर काबू पा लिया गया था। मिर्डल अपनी पुस्तक में भ्रष्टाचार के समाधान का कोई उपाय तो नहीं सुझा पाते लेकिन वे इसे मानवीय समाज की एक मौलिक समस्या का दर्जा अवष्य देते हैं। वास्तव में भ्रष्टाचार का कारण न तो व्यक्ति होता है और न ही विकास। भ्रष्टाचार तो व्यवस्था की उपज है। यदि विकास के ढांचे में भ्रष्टाचार का बढ़ना अनिवार्य है तो वह विकास है ही नहीं।
मनुष्य स्वभाव की विचित्रता मे बुराईयां भी हैं, कमजोरियां भी हैं। इसका असर समाज पर भी पड़ता है। इस पर नियंत्रण के लिये सभ्यता में धर्म, संस्कृति, राज्य व्यवस्था आदि की उत्पत्ति हुई। फिर भी यदि इन बुराइयों पर नियंत्रण नहीं हो पाया तो धर्म, संस्कृति, राज्यए अर्थव्यवस्था सब पर प्रष्न चिन्ह स्वाभाविक है। हाँ, इन संस्थाओं में यदि पारदर्षिता, ईमानदारी, त्याग और सेवा की भावना है तो समाज में भ्रष्टाचार नियंत्रित रहेगा। आजकल भ्रष्टाचार की प्रमुख वजह उपभोक्तावाद और बाजारवाद भी है। बाजार को खोलकर या छूट देकर भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं कसा जा सकता। चाहे लेाकपाल हो या जन लोकपाल बाजार और उपभोक्तावाद पर नियंत्रण उसके बस में नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि ‘‘बड़ा’’ और ‘‘छोटा’’ भ्रष्टाचार दोनों एक जैसे नहीं होते। आम लोगों को यही बताया जाता है कि छोटा चोर और बड़ा चोर दोनों एक हैं। कानून में भी ये दोनों एक नहीं है। भ्रष्टाचार की जिस घटना से राज्य और समाज को ज्यादा हानि पहुंचती है उसे अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिये। सत्ता में प्रतिष्ठित व्यक्तियों का भ्रष्टाचार ज्यादा हानिकारक होता है। रक्षक का भक्षक होना ज्यादा घातक है और इसकी सजा कठोर से कठोर होनी चाहिये। सर्वोच्च पदों पर प्रतिष्ठित व्यक्तियों के गलत तौर तरीकों को नीचे वाले या आम लोग सहज ढंग से अपनाते हैं। इसलिये नीचे के स्तर पर बैठे लोगों का भ्रष्टाचार अपेक्षाकृत कम घातक होगा। इस आपेक्षिक दृष्टि को बैगेर अपनाए हम भ्रष्टाचार की जड़ तक नहीं पहुंच पाएंगे। डॉ. राममनोहर लोहिया ने 1962 में यह सवाल उठाया था कि प्रधानमंत्री पर इतना अधिक तामझाम, फिजूल खर्च क्यों होता है? तब शायद यह सवाल डॉ. लोहिया के लिये ही मखौल बन गया था लेकिन आज यही सवाल भ्रष्टाचार का रूप बन गया है। प्रशासन और सरकार में शीर्ष पर बैठे लोगों के शाहखर्ची, भोग विलाश को आप भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या कहेंगे?
भ्रष्टाचार भारत में मौजूद व्यवस्था का एक अंग है। ऐसे नियम-कायदे बने हुए हैं कि भ्रष्टाचार पनपेगा ही। आज प्रशासन में सुधार करना राजनीति का मुख्य मुद्दा नहीं है। वैसे भी भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में शहरी लोग ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं, इसलिये उनमें भ्रष्टाचार की इस बुनियाद की समझ दिखाई नहीं पड़ती।जाहिर है कि जब तक संपत्ति और सत्ता का गठजोड़ और केन्द्रीकरण रहेगा तथा जहां मुट्ठी भर लोग अपने फैसले से किसी को भी अमीर और किसी को भी गरीब बनाते रहेंगे तब तक समाज में घोर गैरबराबरी रहेगी और भ्रष्टाचार भी रहेगा। भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समतामूलक समाज की स्थापना के लिए बेहद जरूरी है। और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए एक व्यापक जन आंदोलन जरूरी है।
प्रत्येक क्रांति या आंदोलन कुछ बुनियादी मूल्यों के इर्द-गिर्द होते हैं। इन्हीं मूल्यों से प्रेरित होकर लोग समाज में व्याप्त बुराईयों से लड़ते हैं और बदलाव की पहल करते हैं लेकिन जहां भ्रष्टाचार में एक बड़ा वर्ग स्वयं लिप्त हो वहां भ्रष्टाचार खिलाफ असली लड़ाई खड़ा होने में थोड़ा वक्त लग सकता है। क्रांतिकारी लोगों और समूहों को इसकी व्यापक तैयारी करनी पड़ेगी।
आजकल कई प्रदेशों में विकास पर बहुत जोर है। गुजरात और बिहार में तो विकास के नए मॉडल की चर्चा है लेकिन वहीं जब आम लोगों के बीच जाएंगे तो उस (विकास?) की हकीकत का पता चल सकता है। तो यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समतामूलक समाज बनाने के आंदोलन के क्रम में ही हो सकता है, जहां समाज के ढांचे को बदलने के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के संदर्भ में स्थानीय तौर से भ्रष्टाचार के संस्थागत बिन्दुओं पर भी हमला हो सके। इसके बिना भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास विफलताओं और हताशा में ही बदलते रहेंगे।

Saturday, June 25, 2011

सच्चे सत्याग्रह के मायने

डा. ए.के. अरुण
‘‘काला धन’’ और ‘‘भ्रष्टाचार’’ के मुद्दे पर नौ दिन चले बाबा रामदेव के नाटकीय आन्दोलन ने ‘सत्याग्रह’ पर एक नयी बहस छेड़ दी है। कथित देशभक्ति और ईमानदारी के दंभ में डूबे बाबा ने सत्याग्रह को जिस तरीके से पुनः परिभाषित करने की कोशिश की उससे ‘सत्याग्रह’ के नाम पर ही बट्टा लग गया है। ‘‘सत्याग्रह’’ को नये अन्दाज में लोगों ने राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘‘लगे रहो मुन्ना भाई’’ में भी देखा था। अब बाबा रामदेव के इस सत्याग्रह ने तो महात्मा गांधी के ब्रह्मास्त्र कहे जाने वाले ‘‘अनसन सत्याग्रह’’ की तो बाट ही लगा दी।
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को ‘‘निष्किृय प्रतिरोध’’ की संज्ञा दी थी। वे कहते थे कि ‘‘यह एक चौमुंहा खड्ग की तरह है। यह एक बूंद भी रक्त बहाए बगैर दूरगामी परिणाम देता है। यह कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला सकता है। यह दुर्बल मनुष्य का शस्त्र नहीं हैं।’’
महात्मा की एक प्रसिद्ध और प्रमाणिक पुस्तक हिन्द स्वराज में जब पाठक उनसे पूछता है कि ‘‘आप जिस आत्मशक्ति और सत्य की बात कर रहेे हैं उसकी सफलता के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण आपके पास हैं?’’ तो गांधी उत्तर में तुलसी दास के रामचरित मानस से एक दोहा उदृत करते हैं-
‘‘दया धर्म को मूल है, देह मूल अभिमान
तुलसी दया न छोड़िये, जब लग घट में प्राण।’’
वे कहते हैं कि इतिहास केवल युद्धों का ही नहीं सृष्टि और निर्माण का भी है। यदि दुनिया में केवल युद्ध ही हुआ होता तो दुनिया कब की खत्म हो गई होती और आज एक भी व्यक्ति जीवित नहीं बचता।
गांधी ने ‘निष्किृय प्रतिरोध’’ के प्रतीक के रूप में यीशु, डेनियल, क्रेमर, लेटिमर, रिडली आदि का उदाहरण देते हुए लिखा है कि इन लोगां ने सत्याग्रह करते हुए मृत्यु को वरण किया लेकिन अन्याय के सामने झुके नही। ऐसे ही सुकरात ने किया। टाल्सटाय ने भी रूस में जारों के खिलाफ सत्याग्रह किया और अन्ततः सत्य को स्थापित किया। गान्धी ने सत्याग्रह को ‘‘सविनय अवज्ञा’’ की संज्ञा दी। उन्होंने लिखा है कि अवज्ञा सविनय तभी मानी जा सकती है जब वह सच्चे हृदय से की जाए और संयमित हो। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके पीछे कोई द्वेष या घृणा की भावना न हो।
महात्मा गांधी ने 1921 में अपनी पत्रिका यंग इन्डियन में लिखा है कि सविनय अवज्ञा नागरिक का जन्मजात अधिकार है। वह अपनी आदमियत को खोए बगैर इस अधिकार को छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। सविनय अवज्ञा से कभी अराजकता उत्पन्न नहीं होती। वह आपराधिक अवज्ञा से उत्पन्न हो सकती है। प्रत्येक राज्य आपराधिक अवज्ञा को बल पूर्वक कुचल देता है।’’
महात्मा गंधी ने अपनी आटोबायोग्राफी में भी लिखा है कि, ‘‘सत्याग्रही विवेकपूर्वक तथा स्वेछा से समाज के नियमों का पालन करता है; क्योंकि वह इसे अपना पवित्र कर्तव्य मानता है। इस क्रम में वह इस स्थिति मंें आ जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित ऐसा निर्णय वह कर सके।’’ उन्होंने अपनी एक अन्य प्रसिद्ध पत्रिका हरिजन में लिखा है कि’’ सत्याग्रह की पहली अपरिहार्य पूर्व शर्त यह है कि उसमें भाग लेने वाले या सामान्य जनता की ओर से हिंसा शुरू न किये जाने की पक्की गारन्टी हो।’’
बाबा रामदेव ने अपने सत्याग्रह को राष्ट्रधर्म बताया है और कहा है कि भ्रष्टाचार करने वाले और इसे बचाने वाले दोनों राष्ट्रद्रोही हैं और राष्ट्रद्रोहियों की एक मात्र सजा है सजा-ए-मौत। लेकिन महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की अपरिहार्य पूर्व शर्त बताई थी-अहिंसा।
सत्याग्रह के बारे में चर्चा करते हुए हमें इसके स्वरूप पर भी विमर्श करना होगा। बकौल महात्मा गांधी- ‘‘सत्याग्रह शब्द का जनक होने के नाते मैं यह स्पष्ट करने की अनुमति चाहूंगा कि इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रच्छन्न या प्रकट, सभी प्रकार की हिंसा वर्जित है। इसमें मनसा, वाचा, कर्मणा हिंसा का कोई स्थान नहीं है। विरोधी को हानि पहुंचाने के विचार से उसके प्रति द्वेष भाव रखना या उससे अथवा उसके बारे में कठोर वचन बोलना सत्याग्रह को तोड़ना है।... सत्याग्रह में शालीनता है, यह कभी चोट नहीं पहुंचाता। यह क्रोध या दुर्भावना का परिणाम नहीं होना चाहिये। इसमें बतंगड़पन, अधैर्य और शोर शराबे के लिये भी कोई स्थान नहीं है। यह बाध्यता का प्रत्यक्ष विलोम है।’’ महात्मा गांधी ने आगे कहा है-‘‘सत्याग्रह का संघर्ष उसके लिये है जो भावना का दृढ़ हो, जिसमे मन में न सशंय हो और न भीरूता। सत्याग्रह हमें जीने और मरने दोनों की कला सिखाता है।’’
इन दिनों सत्याग्रह के प्रयोग हर गली नुक्कड़ पर देखे जा सकते हैं। राजनीतिक दलों स्वार्थी, पदलोलुप नेताओं और उनके भाड़े के समर्थक जब सत्याग्रह करते हैं जब इस सत्याग्रह का स्वरूप देखते बनता है। वातानुकुलित पन्डाल में पांच सितारा सत्याग्रह की झलक हम सबने पिछले कुछ महीनों में कई बार देखी है। कथित सत्याग्रह में सत्ता पक्ष और विपक्षी दल सभी शामिल रहे हैं।
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की संहिता का जिक्र करते हुए स्पष्ट लिखा है-जिसमें कानून का पालन करने की सहज वृति नहीं वह सत्याग्रही ही नहीं। ‘‘उन्होंने सत्याग्रह को सत्याग्रहियों का ब्रह्मास्त्र बताया है। सत्याग्रही की योग्यता का जिक्र करते हुए गांधी लिखते हैं-‘‘सत्याग्रही की सत्य में अटूट आस्था होनी चाहिये। उसे अहिंसा को अपना धर्म मानना चाहिये। उसे पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए तथा अपने ध्येय की पूर्ति के लिये अपना जीवन और सम्पत्ति को न्योछावर करने के लिए सदैव तैयार करना चाहिये। उसका जीवन सादा और उच्च विचार वाला हो। उसे सदा जेल माने के लिए तैयार रहना चाहिये। उसे मृत्यु का भय न हो।’’ महात्मा ने साफ लिखा है कि सत्याग्रह में कपट, मिथ्या या किसी भी प्रकार के असत्य के लिये कोई स्थान नहीं है। गांधी ने सत्याग्रही को साफ हिदायत दी है कि सत्याग्रही को दमन से बिल्कुल नहीं डरना चाहिये।
महात्मा गांधी सत्याग्रह को आत्म बल का पर्याय बताते हैं। वे कहते हैं कि यह शस्त्रबल से भी श्रेष्ठ है। इस तर्क के पक्ष में गांधी एक सवाल करते हैं। वे पूछते हैं-‘‘तोप से सैंकड़ों को उड़ाने में साहस चाहिये या तोप से बंध कर मुस्कुराते हुए चिंदी-चिंदी होकर बिखर जाने में? असली योद्धा कौन है? वह जो मौत को अपने जिगरी दोस्त की तरह साथ लेकर घुमता है या वह जो दूसरों की मौत अपने नियंत्रण में रखता है? साहस विहीन और पुरुषत्वहीन कभी सत्याग्रही नहीं हो सकते।’’
आजादी के बाद वैश्वीकरण के दौर में सरकारों के निरकुंश व जन विरोधी होने के अनेक प्रमाण देखे जा सकते हैं। कांग्रेस हो या भाजपा, समाजवादी पार्टी हो या बसपा, दक्षिण भारत के छोटे राजनीतिक दल हों या और कोई लगभग सभी अब मूल्यृवीहिनता के पर्याय हैं। कम्पनियों और पूंजीपतियों के लिये लठैत की भूमिका निभा रहे ये सभी राजनीतिक दल जब भी सत्ता में होते हैं एक जैसा ही वर्ताव करते हैं, ऐसे में जनता का उद्वेलित होना स्वाभाविक है लेकिन सत्याग्रह की सही समझ के अभाव में सत्याग्रह के नाम पर हिंसा और प्रतिहिंसा ही अभिव्यक्त होती है। जाहिर है इससे निरकुंश सरकार की तानाशाही वृति को ही बल मिलता है। अन्याय का विरोध करने से पहले जरूरी है कि विरोध के तरीके और उसके अस्त्र, अस्त्र चलाने की तकनीक, प्रशिक्षण आदि पर ठीक से विचार हो वर्ना यह ‘‘ब्रह्मास्त्र’’ फिस्स हो जाएगा और इससे जुल्म करने वाले को ही बल मिलेगा।
लेखक जाने माने चिकित्सक एंव अहिंसावादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

Thursday, April 28, 2011

क्यों उपेक्षित हैं महिलाएं?

जानी मानी फ्रेंच लेखिका ‘‘सीमोन द बोउवार’’ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘द सेकेन्ड सेक्स’’ में जब कहती हैं कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है’’ तो कई विद्वानों को लगता है कि यह टिप्पणी तो पुरूषों के साथ बड़ी ज्यादती है। लेकिन इस टिप्पणी के दशकों बाद भी आज समाज में महिलाओं की स्थिति इसे और पुष्ट करती है। यह बताने की जरूरत नहीं कि महिलाएं आज भी समाज में दोयम दर्जे पर हैं।
चर्चा शिक्षा की हो या रोजगार की, विकास की हो या स्वास्थ्य की लगभग सभी क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की है। संयुक्त राष्ट्र संघ के भारतीय समन्वयक कार्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट के आंकड़ों को देखें तो अधिकांश औरतें जीवन भर जरूरत से कम पोषण पाती हैं-उनमें खुन की कमी होती है और वे जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा कुपोषित रहकर गुजारती है। आंकड़े कहते हैं कि 76 प्रतिशत मर्दो की तुलना में सिर्फ 54 प्रतिशत भारतीय औरतें साक्षर हैं। औरतें जीवन भर परिवार के भीतर और बाहर हिंसा का सामना करती हैं। पुलिस एवं क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रत्येक 26 मिनट पर एक औरत के साथ यौन छेड़-छाड़ प्रत्येक 34 मिनट पर बलात्कार और हर 42 मीनट पर यौन उत्पीड़न होता है। प्रत्येक 43 मिनट पर एक औरत अगवा की जाती है और हर 93 मीनट पर एक औरत को मार दिया जाता है।
भारत में औरतों की जनसंख्या पर नजर डालें तो पिछली जनगणना 2001 के अनुसार देश की 103 करोड़ जनसंख्या में 49 करोड़ 60 लाख तो औरते हैं। सन् 2016 तक अनुमान है कि भारत में औरतों की संख्या 60 करोड़ 15 लाख हो जायेगी। भारत में औरतों की जनसंख्या अमरीका, कनाडा तथा रूस की सम्मिलित कुल जनसंख्या से ज्यादा है। जनसंख्या में औरतों तथा मर्दों की संख्या के अनुपात से हमें उस देश में जेन्डर समानता के स्थिति का पता चलता है। जिन समाजों में औरतों तथा मर्दों की संख्या के अनुपात से हमें उस देश में जन्डर समानता के स्थिति का पता चलता है। जिन समाजों में औरतों तथा मर्दों के साथ समान व्यवहार किया जाता है वहां औरतें मर्दों से ज्यादा जीवन जीती हैं कहते हैं कि ऐसे समाज में 100 पुरूषों के मुकाबले 103-105 स्त्रियों की उम्मीद रहती है।
भारत में स्त्री-पुरूष का अनुपात देखें तो स्थिति भिन्न है। सन् 2001 की जनगणना में प्रत्येक 1000 पुरूषों पर केवल 933 स्त्रियां थी। केरल को यदि अपवाद मान लें तो लगभग प्रत्येक राज्य में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कम हैं। सन् 2001 के आकड़ों में ही हरियाणा और पंजाब में प्रति व्यक्ति अच्छी आय के बावजूद 1000 पुरूषों पर क्रमश सिर्फ 861 और 874 स्त्रियां हैं अमदनी के दृष्टि से सबसे कमजोर प्रदेश उड़िसा में प्रति 1000 पुरूषों पर 972 स्त्रियां है।
केवल सरकारी आंकड़े ही औरतों की पूरी कहानी नहीं बताते। आम व्यवहार में भी औरतें दोयम दर्जे पर ही देखी जाती हैं। 1999 में किए गए एक सर्वेक्षण में यह बताया गया कि समाचार कार्यक्रमों में मर्दें की मौजुदगी मुख्य होती है। इनमें औरतों को केवल 14 प्रतिशत ही जगह मिली। 1999 में ही एक महीने तक अंग्रेजी के दो मुख्य समाचार पत्रों के विश्लेषण से मालूम हुआ कि आज भी प्रकाशन माध्यमों में औरतों को सिर्फ हाशिये पर जगह मिलती है। अनेक अखबार तथा पत्रिकाएं आज भी औरतों के मुद्दों से जुड़े लेख सिर्फ साप्ताहिक पृष्टों पर ही प्रकाशित करते हैं। मुख्य पृष्ठों पर औरतों की मौजूदगी या तो विज्ञापनों में होती है या अपराध और सामाजिक घटनाओं के समाचारों में।
आकड़ों की यह कहानी औरतों के प्रति पुरूषों के तंगनजरी को ही बयान करते हैं। आम घरों में औरतों की सेहत को भी उपेक्षित नजर से ही देखा जाता है। आबादी के विस्फोट पर काबू पाने के लिये बनाई गई विभिन्न सरकारी योजनाएं भी औरतों को राहत नहीं दे पाई, मसलन औरतों का स्वास्थ्य दिन प्रति दिन गिरता ही जा रहा है। अपने देश की स्वास्थ्य प्रणाली में औरतों की सेहत समबन्धी समस्याओं को ‘‘मातृ स्वास्थ्य’’ के अर्न्तगत रखा गया है। आमतौर पर 15 से 40 वर्ष की औरतों को जैविक रूप से कमजोर माना जाता है, क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य समबन्धी अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, विशेषकर महिलाओं को गर्भावस्था का अतिरिक्त जोखिम भी रहता है। यह जोखिम भारत में और भी ज्यादा है। क्योंकि भारतीय औरतों में ‘‘जच्चा मृत्यु दर’’ विकसित देशों से कहीं ज्यादा है।
आंकड़ों में देखें तो भारत में जच्चा मृत्युदर 4.6 प्रति हजार जीवित जन्म है। अर्थात प्रति 10 हजार जीवित रहे बच्चे को जन्म देते समय 46 माताओं की मृत्यु हो जाती है, जबकि कनाडा में यह दर मात्र 0.5 प्रति हजार है। भारत में औरतें पुरूषों के मुकाबले कम उम्र में ही मर जाती हैं जबकि विकसित देशों में स्थिति बिल्कुल उलटी है। हमारे देश में स्त्री-पुरूष अनुपात (प्रति हजार पुरूषों पर स्त्रियों की संख्या) भी अन्य देशों से कम है। भारतीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में स्त्री-पुरूष का लिंग अनुपात यदि 933ः1000 है तो रूस में 1140ः1000 तथा जापान में यह 1040ः1000 है। भारत में स्त्रियों की संख्या में गिरावट का यह सिलसिला बीते 20-25 वर्षों में शुरू हुआ है।
भारत में औरतों के खराब सेहत की कई और वजहें हैं। जैसे कुपोषण, स्वास्य सुविधाओं का अभाव, परिवार में उपेक्षा, उनकी खराब सामाजिक स्थिति, अशिक्षा, काम का दबाव आदि। भरतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के आंकड़ों के अनुसार 27 प्रतिशत ग्रामीण लड़कों की तुलना में 52 प्रतिशत ग्रामीण लड़कियां कुपोषित या अल्पपोषित हैं। शहरी मध्यम वर्ग में यह आंकड़ा 9.8 प्रतिशत लड़कों के मुकाबले लड़कियों में 15 प्रतिशत है। परिषद के ही एक अन्य आकड़े के अनुसार पुरूष अपना 31 प्रतिशत काम निबटाने के लिए 2473 कि. कैलोरी उर्जा खर्च करता है जबकि इससे लगभग दो गुना ज्यादा 53 प्रतिशत कार्य करने के लिए स्त्रियां 2000 से भी कम कैलोरी खर्च कर पाती हैं। इसी आंकड़े के अनुसार भारत के गांवों में पुरूषों प्रति दिन 1700 कैलोरी उर्जा की तुलना में महिलाओं को 1400 कैलोरी ही मिल पाता है। महिलाएं बीमारी के बावजूद भी स्वास्थ्य सुविधाओं या उपचार का लाभ सिर्फ इस लिए नहीं ले पातीं कि उन पर घर-परिवार के काम का दबाव ज्यादा है। औरतों के बुरे सेहत की एक और मुख्य वजह उनकी खराब सामाजिक स्थिति भी है। भरतीय समाज आज भी पुरूष प्रधान समाज है।
लिंग भेद विरोधी अनेक कानूनों के बावजूद भी हमारे समाज में ‘‘स्त्री भ्रूण हत्या’’ जारी है। वैश्वीकरण के प्रभाव में अपनाई जा रही नित नयी योजनाओं में प्रकारान्तर से स्त्री/बालिका यौन शोषण बढ़ रहा है। देश में तेजी से विकसित हो रहा पर्यटन उद्योग बालिका/स्त्री शोषण को महिमामंडित कर रहा है। ‘‘खुलापन’’ के नाम पर ‘‘नंगापन’’ बढ़ रहा है। कार्पोरेट की तर्ज पर कई छोटी कम्पनियों में भी लड़की वर्कर की मांग बढ़ी है। लेकिन वहां भी नजरिया यौन शोषण ही है। कुल मिला कर स्थिति महिलाओं के उत्थान के पक्ष में कम पतन की तरफ ज्यादा है।
सन् 2000 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का एक प्रारूप तैयार किया था जिसमें सन् 2010 तक राष्ट्रीय सामाजिक जनांकिकीय लक्ष्य ;छंजपवदंस ैवबपंस क्मउवहतंचीपब हवंसद्ध में शिशु मृत्युदर/मातृ मृत्यु दर को कम करने अवयस्क बालिका विवाह को रोकने, प्रजनन और बाल स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने, स्त्री पुरूष अनुपात में प्रमुख रूप से भारतीय चिकित्सा पद्धतियों तथा होमियोपैथी को मुख्य धारा में लाने, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों पर होमियोपैथी तथा देशी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों को नियुक्त करने, इन चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सकों से ‘‘वेयरफुट डाक्टर’’ के रूप में सेवाएं लेने आदि की योजना है। इसके साथ-साथ महिलाओं के सामाजिक राजनीतिक अधिकारों को सशक्त करने, समाज में उनके प्रति नजरिया बदलने की ज्यादा जरूरत है। उम्मीद है कि हमारा समाज संविधान में वर्जित लैगिक व सामाजिक समानता का मानसिक व व्यावहारिक रूप से स्वीकार करे ताकि आधी आबादी की वृद्धि क्षमता का सुदपयोग हो सके।

जैतापुर की ‘‘रौशनी’’ या ‘‘आग’’

पिछले साल परमाणु करार पर संसद में बहस के दौरान कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अपनी तकरीर में किसान आत्महत्याओं के लिये चर्चित विदर्भ की शशिकला का जिक्र करते हुए कहा था - ‘‘शशिकला के बच्चे लालटेन की रौशनी में पढ़ने को मजबूर हैं, लेकिन परमाणु बिल पारित होने के बाद शशिकला जैसे लोगों के परिवारों को बिजली मिलेगी और इनका सशक्तिकरण होगा।‘‘ ऐसी ही एक शशिकला विधवा हमीदा जो छः बच्चों की माँ है कहती है, ‘‘अरेवा परमाणु परियोजना हमारे लिए एटम बम की तरह है।’’ आज भले ही सरकार ने जैतापुर परमाणु संयंत्र के खिलाफ व्यापक जनआक्रोश को नकार कर इस परियोजना को हरी झण्डी दिखा दी हो लेकिन अरेवा और जैतापुर के इलाके से आने वाली खबरें बता रही हैं कि वहाँ के लोगों ने किसी भी कीमत पर इस परियोजना के खिलाफ डटे रहने का संकल्प व्यक्त किया है। खबर यह भी है कि रत्नागिरी जिले के कोई 100 स्कूलों के बच्चों ने भी अरेवा परियोजना के खिलाफ दो दिनों तक ‘‘स्कूल बन्द - पढ़ाई ठप्प’’ आन्दोलन चलाया है। अरेवा की नूरेशा कहती है - ‘‘यदि यह परियोजना नहीं रुकी तो हमारे पास विदर्भ के किसानों की तरह आत्महत्या के सिवाय और कोई चारा नहीं बचेगा।’’
उल्लेखनीय है कि जैतापुर परमाणु परियोजना भारत-अमरीका परमाणु समझौता के प्रभावी होने के बाद सम्भवतः पहली परियोजना है जिस पर सरकारें अडिग हैं। इस पर अमरीका, फ्रांस और भारत सरकार का स्वार्थ दांव पर लगा है। जाहिर है जैतापुर परमाणु परियोजना को जैसे भी हो सरकार पूरा करना चाहेगी क्योंकि इस पर भविष्य की सभी परमाणु परियोजनाओं का दारोमदार है। उधर रत्नागिरी जिले के कई गांवों की महिलाएँ, बच्चे और पुरुष जगह-जगह पर धरना देते, प्रदर्शन करते दिख जाएंगे। वहाँ की दीवारों पर गेरु व रंगों से लिखे नारे रोज ब रोज ताजा किये जाते हैं - ‘‘आमचा जीव घेण्या पूर्वी या प्रकल्पाचा धूवू’’ अर्थात् इसके पहले कि यह परियोजना हमारी जान ले आओ हमीं इसकी जान ले लें।
हाल ही में जापान में आए भीषण सुनामी और इसमें ध्वस्त फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर में विस्फोट एवं रिसते रेडिएशन का असर (जो चेरनोबिल से कहीं ज्यादा है) की स्वीकारोक्ति के बाद जहाँ जापान सरकार ने अपने यहाँ सभी परमाणु परियोजनाओं पर पुर्नविचार का निर्णय लिया है वहीं जापान के भारत में राजदूत अकीटाका साईकी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान से विगत सोमवार को मिलकर इस परमाणु परियोजना को जारी रखने की अपील की है। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में प्रस्तावित कई परमाणु बिजलीघर एवं अन्य विकास योजनाओं में जापान का काफी कुछ दांव पर लगा है। फुकुशिमा हादसे के बाद केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जहाँ कई बड़ी परमाणु बिजली परियोजनाओं पर ‘‘विराम’’ की बात कही थी वहीं आज ‘‘विराम नहीं’’ कहते नजर आ रहे हैं। जयराम रमेश कहते हैं कि परियोजना पूरी हो जाने के बाद जब 2019 में ये रियेक्टर शुरू हो जाएंगे तब पर्यावरण पर इसके व्यापक प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा।
जैतापुर व अन्य परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं पर चर्चा के बहाने आइये यह भी जान लें कि जैतापुर परमाणु बिजली परियोजना का आर्थिक गणित क्या कहता है। दरअसल जैतापुर प्रोजेक्ट सबसे मंहगे योरेपीय प्रसेराइज्ड रिएक्टर्स (ई.पी.आर.) पर आधारित है। यहां 1650 मेगावाट के जो छः रियेक्टर लगने वाले हैं उनमें से प्रत्येक की कीमत तकरीबन 7 अरब डालर है। इस हिसाब से यहां की लागत प्रति मेगावाट 21 करोड़ रुपये बैठेगी। इसमें ईंधन और संयंत्र के रख-रखाव की कीमत शामिल नहीं है। यह तो सीधे तौर पर होने वाले खर्च हैं लेकिन इसके परोक्ष खर्चे जो इससे कम नहीं होंगे उसकी तो बात ही न करें। अन्य उपलब्ध विकल्पों से प्राप्त बिजली की कीमत और जैतापुर से पैदा होने वाली बिजली की केवल लागत पूंजी पर आधारित कीमत की तुलना करें तो यह 8 से 9 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट ज्यादा बैठते हैं। जैतापुर परमाणु विद्युत की कीमत के बारे में अब तक का अनुमान कहता है कि यह बिजली 5 से 8 रुपये प्रति यूनिट मंहगी होगी। आज की कीमतों में यह (लगभग 2.50 रुपये प्रति यूनिट) कोई तीन गुना ज्यादा है।
परमाणु बिजली के पैरोकारों को क्या कहें। क्या उन्हें पता नहीं कि हिरोशिमा और चेरनोबिल आज भी झुलस रहे हैं? हाल में जापान में आए सुनामी और वहाँ के सर्वाधिक सुरक्षित फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के टूट कर बिखर जाने के सबक के बाद भी हम ‘‘रौशनी’’ और ‘‘आग’’ में फर्क नहीं कर पा रहे हैं। 6 अगस्त 1945 के परमाणु विध्वंस के बाद मशहूर जापानी कवि शुन्तारो ताकीनाबा ने लिखा था -
‘‘कोई और नहीं जो मेरी जगह मर सके, इसलिये मुझे ही मरना चाहिये...’’
रत्नागिरी में वहाँ के एक चिकित्सक एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता डा. विवेक भिड़े कहते हैं - ‘‘रत्नागिरी तो पहले से ही विकास (?) की मार झेल रहा है। थर्मल पावर प्लान्ट, रसायन उद्योग और वैध-अवैध खनन से इतना प्रदूषण हो रहा है कि यहां जिन्दगी नरक से भी बदतर है। अब इस परमाणु परियोजना ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी।’’ भारत के जाने माने परमाणु वैज्ञानिक एवं परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (ए.ई.आर.बी.) के पूर्व अध्यक्ष ए. गोपालकृष्णन कहते हैं,-‘‘पूरी दुनिया में अभी तक कहीं भी इस ई.पी.आर. तकनीक के रियेक्टर का निर्माण नहीं हुआ है। अब तक इसे जहां भी मंजूरी दी गई है वहां भी इसका काम पूरा नहीं हुआ है। अरेवा ई.पी.आर. परियोजना के तहत फिनलैण्ड और फ्रांस में जो निर्माण कार्य हो रहा था उसमें भी काफी विलंब हो चुका है। फ्रांस सरकार द्वारा इस बाबत कराई गई जांच में यह पाया गया है कि यह देरी इस परियोजना की डिजाइन की गम्भीर गड़बड़ियों और सुरक्षा सम्बन्धी अनसुलझे सवालों के कारण हो रही है।’’
जैतापुर के लोगों का गुस्सा इसलिए भी है कि प्रदेश सरकार के ‘‘एनवायरनमेन्ट इम्पैक्ट एसेसमेन्ट (ई.आई.ए.) ने प्रभावित इलाके को बंजर भूमि के तौर पर घोषित किया है। विडम्बना यह है कि महाराष्ट्र सरकार के रिकार्ड में रत्नागिरी जिले को बागवानी जिले का दर्जा प्राप्त है। यह इलाका अलफासों आम के साथ साथ काजू, नारियल, चीकू, कोकम, सुपारी जैसे महत्वपूर्ण फल उत्पादों के इलाके के रूप में जाना जाता है। मजे की बात यह भी कि प्रस्तावित परियोजना स्थल तथा इसके आसपास का इलाका महाराष्ट्र सरकार द्वारा एग्रो इकोनोमिक जोन और टूरिस्ट जोन के बतौर भी घोषित है। यहां जो जमीन कृषि लायक नहीं है वह पशुओं के चारागाह के तौर पर इस्तेमाल होता है। रत्नागिरी क्षेत्र विशाल मैंग्रोव से भी समृद्ध है लेकिन एनवायरमेन्ट इम्पैक्ट एसेसमेन्ट में यह इलाका 70 फीसद बजंर घोषित किया गया है। जाहिर है, परियोजना की अनिवार्यता सरकार की आंख बन्द कर देती है। शायद इसीलिये पर्यावरण मंत्री को भी अपनी जबान बदलनी पड़ती है।
एक बात और जहां परमाणु परियोजना स्थापित होनी है उस संकरी खाड़ी के दूसरे तट पर समुद्र से सटा एक गाँव है - साखरी नाटे। यह गाँव 5000 मछुआरों का गाँव है। ये मछुआरे अलग से आतंकित हैं क्योंकि परमाणु बिजली घर के गर्म व रेडियेशन युक्त पानी से यहां की मछलियों और जीव जन्तुओं के नष्ट होने, इससे उनकी जिन्दगी खत्म हो जाने का खतरा जो है। यह जानना भी दिलचस्प है कि यह गाँव जापान, योरोप और अन्य बड़े देशों को बड़ी मात्रा में मछली निर्यात करता है। जानकार बताते हैं कि इस परियोजना से यहाँ के साखरी नाटे गाँव के अलावा अन्य 10-12 गाँव भी उजड़ जाएंगे।
जैतापुर परमाणु परियोजना से प्रभावित गाँव व लोगों में अभी तक मात्र 112 लोगों ने मुआवजा लिया है। ये भी वे लोग हैं जो अनुपस्थित भूस्वामी हैं और इनका जमीन से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ की जमीन का मुआवजा 11200 रुपये प्रति एकड़ तय किया गया है। जिसे ग्रामीण ‘‘तुच्छ’’ बताते हैं। हापुस आम के पेड़ जिसकी उम्र 100 साल होती है, की कीमत कौड़ियों जैसी लगाई गई है। इन सभी तथ्यों और स्थितियों में वहाँ के लोगों ने लगभग सभी दीवारों पर एक नारा लिख रखा है -
‘‘जो आमचा आड आला तो सौ प्रतिशत गेला ‘‘यानि जो भी हमारे रास्ते मे आएगा वह निश्चित तौर पर जाएगा। बहरहाल जैतापुर और वहाँ के लोगों की नियति क्या होगी फिलहाल कह नहीं सकता, हाँ सरकार ने तो तय कर लिया है - जैतापुर परियोजना बनके रहेगी।

Saturday, November 27, 2010

Corticobasal Degeneration(CBD) & Homoeopathy

Corticobasal degeneration (CBD) is a rare neurological disease in which parts of the brain deteriorate or degenerate. CBD is also known as corticobasal ganglionic degeneration, or CBGD.
Several regions of the brain degenerate in CBD. The cortex, or outer layer of the brain, is severely affected, especially the fronto-parietal regions, located near the center-top of the head. Other, deeper brain regions are also affected, including parts of the basal ganglia, hence the name "corticobasal" degeneration. The combined loss of brain tissue in all these areas causes the symptoms and findings seen in people with CBD.
Causes of Corticobasal Degeneration
Unfortunately, the cause of CBD is entirely unknown. There is currently no strong evidence to suggest CBD is an inherited disease, and no other risk factors, such as toxins or infections, have been identified.
Studies of brain tissue of individuals with CBD show certain characteristic cell changes. Similar, although not identical, changes are observed in two other neurodegenerative diseases, Pick's disease and progressive supranuclear palsy. These changes, involving a brain protein called tau, have provided researchers some initial clues in their search for the causes of CBD.
Symptoms of Corticobasal Degeneration
Symptoms of CBD usually begin after age 60. The initial symptoms of CBD are often stiffness, shakiness, jerkiness, slowness, and clumsiness, in either the upper or lower extremities. Other initial symptoms may include dysphasia (difficulty with speech generation), dysarthria (difficulty with articulation), and difficulty controlling the muscles of the face and mouth, or walking and balance difficulties. Symptoms usually begin on one side of the body, and spread gradually to the other. Some patients (probably more than commonly recognized in the past) may have memory or behavioral problems as the earliest or presenting symptoms.
CBD is a progressive disease, meaning the symptoms worsen over time. Over the course of one to several years, most people with CBD gradually worsen, with symptoms progressing to involve upper and lower extremities and other body regions. Symptoms of advanced CBD include:
• parkinsonism (rigidity, slow movements, postural instability)
• tremor
• myoclonus (sudden, brief jerky movements)
• dystonia, including blepharospasm
• speech difficulty
• mild-to-moderate cognitive impairment (memory loss, difficulty planning or executing unrehearsed movements, dementia)
• sensory loss
• "alien hand/limb" phenomenon (difficulty controlling the movements of a limb, which seems to undertake movements on its own, sometimes combined with a feeling that the limb is not one's own)
Diagnosis of Corticobasal Degeneration
Early in the disease course, it is often difficult to distinguish CBD from similar neurodegenerative diseases. Diagnosis of CBD involves a careful neurological exam, combined with one or more types of laboratory evaluations. Electrophysiological studies, including an EEG (electroencephalogram), may show changes in brain function over time that are consistent with the neurodegeneration. CT or MRI scans can also be used in this way, providing images of asymmetric atrophy of the fronto-parietal regions of the brain's cortex, the regions most frequently involved in the disease.
Approaches to Treatment
Unfortunately, there are no drugs or other therapies that can slow the progress of the disease, and very few that offer symptomatic relief. Tremor and myoclonus may be controlled somewhat with some allopathic drugs such as clonazepam. Baclofen may help reduce rigidity somewhat. Levodopa and other dopaminergic drugs used in Parkinson's disease are rarely beneficial, but may help some CBD patients.
Homoeopathy
In Homoeopathy there are some Medicines which can help to reduce the severity of disease, i.e Argentum Met, Aur.S, Camph mbr., Causticum, Hyos., Merc Sol. Phos, Plumb., Zinc.cy.
I have little better experience with Argent.met., Causticum, Phosphorus & Plumbum in CBD patients.
Physical therapy exercises may be useful to maintain range of motion of stiff joints. This may prevent pain and contracture (muscle shortening), and help maintain mobility. Occupational therapy may be used to design adaptive equipment that supports the activities of daily living, thus helping to maintain more functional independence. Speech therapy is used to improve articulation and volume.
A person with CBD will usually become immobile due to rigidity within five years of symptom onset, and may require a gastrostomy tube for feeding at some point before that. Most often, within ten years of onset, pneumonia or other bacterial infections may lead to life-threatening complications.

बढ़ती महामारियों के दौर में

  कोरोना वायरस के त्रासद अनुभव के बाद अब देश में एच 3 एन 2 इन्फ्लूएन्जा वायरस की चर्चा गर्म है। समाचार माध्यमों के अनुसार...