Monday, May 18, 2020

कोरोनासंक्रमण काल में महिलाएं


 कोरोनासंक्रमण के इस विकट काल में भी जहां कुछ बड़े देशों के बड़बोले राजनेता अपनी जनता को उसके भाग्य भरोसे छोड़कर अपनी ब्राडिंग में ही व्यस्त हैं वहीं कुछ छोटे देशों में महिला नेतृत्व अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता का उपयोग कर अपनी जनता को कोरोनासंक्रमण और इसके नुकसान से बचाने का सफल उदाहरण पेश कर रही हैं। लगभग एक ही समय में कोरोनासंक्रमण से प्रभावित होने वाले देशों में जहां के शासक केवल मन की बात करते रहे वहां की जनता कोरोना कहर को भुगत रही है लेकिन दूसरी तरफ जहां के शासक गम्भीर और संवेदनशील हैं वहां कोरोनासंक्रमण की स्थिति नियंत्रण में है। इस लेख में मैं ंकोरोनासंक्रमण से प्रभावित देशों के महिला नेतृत्व की पड़ताल करूंगा और यह भी समझने की कोशिश करूंगा कि इस संक्रमण काल में महिलाओं की क्या स्थिति है और इससे महिलाएं कितनी प्रभावित हैं।
अध्ययन और आंकड़े बता रहे हैं कि कई देश जहां महिलाएं शासन में हैं वहां कोरोनासंक्रमण से नुकसान तो हुआ लेकिन वह अन्य देशों की तुलना में काफी कम हुआ। न्यूजीलैंड, नार्वे, आइसलैंड, ताइवान, डेनमार्क, जर्मनी, बांग्लादेश, म्यांमार आदि देशों में न केवल मृत्युदर कम रहा बल्कि आर्थिक नुकसान भी अपेक्षाकृत कम हुआ। यदि हम भारतीय उपमहाद्वीप की ही बात करें तो बांग्लादेश और म्यामार में भारत और पाकिस्तान की तुलना में मृत्यु दर बहुत कम रही है। कोरोना वायरस से निबटने में दक्षिण कोरिया की तैयारी और सक्रियता को दुनिया ने भी सराहा लेकिन यह कम लोगों को ही पता होगा कि वहां संचारी रोग नियंत्रण की प्रमुख सुश्री जेयोंग यून क्येओंग हैं। इन्होंने ही टेस्ट ट्रेसिंग एवं कन्टेन का फार्मूला अपनाया था। इस महिला अधिकारी को ही यह श्रेय है कि एक समय में चीन के बाद सबसे अधिक सवंमित लोगों की संख्या के बाद भी वहां केवल 250 लोगों की ही मौत हुई। इन्होंने स्वयं प्रेस कान्फ्रेंस कर रोजाना लोगों की हिम्मत बढ़ाई और हालात से निबटने के तरीके बताए। इसी वजह से सुश्री क्येयोंग को अब लोग दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ष्वायरस शिकारीष् के तौर पर जानने लगे हैं।
कोरोनासंक्रमण के इस अभूतपूर्व दौर में पश्चिमी मीडिया में तो महिलाओं के नेतृत्व क्षमता पर अनेक लेख प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन भारत का गोदी मीडिया शुरू से ही जनता को बकवास खबरों में उलझाकर उन्हें सही सूचना से वंचित रख रहा है। वैसे देखें तो दुनिया में लगभग 7 या 8 फीसद देशों की प्रमुख महिलाएं हैं पर कोरोनासंक्रमण के इस दौर में उनकी दृष्टि, मानवीयता एवं प्रशासनिक क्षमता वास्तव में प्रेरणादायी है। यह अलग बात है कि कुछ देशों में दंभी नेताओं की महत्वाकांक्षा की वजह से वहां की जनता बदहाल, निराश और असहाय महसूस कर रही है। न्यूजीलैण्ड में सुश्री जेसिंदा आर्देन महिला प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने अपनी सक्रियता से केवल 18 मौतें दर्ज कराकर बेहद कम समय में ही देश में लाकडाउन खोल दिया है। ऐसे ही डेनमार्क की महिला प्रधानमंत्री मेटे फ्रेदेरिक्सें ने शुरू में ही सख्ती से लाकडाउन किया और 370 मौतों के बाद कोरोनासंक्रमण को लगभग नियंत्रित कर दिया है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल नें भी अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता की वजह से कोरोनासंक्रमण को नियंत्रित कर लिया है। आइसलैण्ड की प्रधानमंत्री कटरीन जकोब्सदोत्तिर ने न तो स्कूलों को बन्द किया और न ही सख्त पाबंदियां लगाईं। उन्होंने प्रत्येक नागरिक के लिए मुफ्त परीक्षण की व्यवस्था की। परिणामस्वरूप वहां केवल 1800 लोग संक्रमित हुए और मात्र 10 व्यक्तियों की मृत्यु हुई।
फिनलैण्ड में कोरोना के 4000 मामले दर्ज किए गए और यहां 140 लोगों की मृत्यु हुई। यह संख्या प्रति दस लाख आबादी के सन्दर्भ में पड़ोसी देश स्वीडन की तुलना में 10 फीसद भी नहीं हैं फिनलैण्ड की प्रधानमंत्री सेन्ना मरीन सम्भवतः दुनिया की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री है जिन्हांेंने लोगों से सख्ती से लाकडाउन का पालन करवाया। भारत में यहां का मीडिया मोदी भक्ति में इस कदर डूबा है कि उसे देश की बहुसंख्य आबादी की बदहाली नहीं दिखती। आम लोगों का ध्यान भटकाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान का रोज राग अलापने वाला गोदी मीडिया अपने पड़ोसी देशों में कोरोनासंक्रमण और इससे उत्पन्न हालातों को सम्हालती महिला नेतृत्व को भला कहां देख पाएगा ? मैं बताता हूं, अपना पड़ोसी देश बांग्लादेश का नेतृत्व कर रहीं शेख हसीना के कुशल नेतृत्व ने 17 मई तक 298 मौत एवं 20,065 मामलों तक कोरोनासंक्रमण को नियंत्रित रखा। ऐसे ही म्यांमार की महिला प्रधानमंत्री आगं सां सूकी की नेतृत्व का ही कमाल है कि वहां 17 मई तक कोरोनासंक्रमण के कुल 181 मामले और 6 मौतों के बाद तबाही का आंकड़ा लगभग थमा हुआ है। ऐसे ही कैरीबियाई द्वीप समूह के बहुत छोटे देश सैंट मार्टिन की महिला प्रधानमंत्री सिल्बेरिया जकोब्स ने अपने कठोर निर्णय के बावजूद जनता को ज्यादा परेशान नहीं किया।
खैर, यह तो विभिन्न देशों के महिला शासकों की नेतृत्व क्षमता की बात थी लेकिन कोरोनासंक्रमण काल में महिलाओं की स्थिति कुल मिलाकर कैसी रही यह चर्चा भी जरूरी है। बीते दो महीने के आंकड़े यदि देखें तो कोरोना संक्रमण में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कम संक्रमित हुई हैं लेकिन बावजूद इसके उनकी परेशानियां पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं। अमरीका में कोरोना से मरने वाली महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या दो गुनी से ज्यादा है। ऐसे ही पश्चिमी योरोप में कोरोना से मरने वाले 31 फीसद महिलाएं हैं तो पुरुष 69 फीसद हैं। यही स्थिति चीन और भारत की भी है। भारत में कोरोनासंक्रमण में स्त्री पुरुष का आंकड़ा अनुपात 3ः1 का है। यानि 73 फीसद पुरुषों की तुलना में 27 फीसद महिलाओं की ही मृत्यु हुई है। लगभग यही आंकड़ा संक्रमण का भी है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के कम संक्रमित होने के कारणों पर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, लन्दन के प्रोफेसर फिसिप गोल्डर कहते हैं कि ‘‘महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुषों की तुलना में बेहतर होती है। कोरोना वायरस या किसी भी वायरस संक्रमण में वायरस को सक्रिय होने के लिये खास तौर पर जिस प्रोटीन की आवश्यकता होती है वह हैं ‘‘एक्स क्रोमोजोम’’। महिलाओं में दो एक्स क्रोमोजोम होता है जो उनके इम्यून सिस्टम को मजबूत रखता है। महिलाओं में इम्यून कोशिका के सक्रिय होने की दर पुरुषों की तुलना में ज्यादा है। इसके अलावा महिलाओं का शरीर पुरुषों की तुलना में ज्यादा एन्टीबाडिज उत्पन्न करता है।
प्राकृतिक तौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में भले ही ज्यादा स्वस्थ एवं मजबूत इम्यूनिटी वाली हों लेकिन सामाजिक और राजनीतिक तौर पर उन्हें दबाने और परेशान करने में पुरुष नेतृत्व एवं पुरुष वर्चस्व जरा भी पीछे नहीं है। कोरोनासंक्रमण की वजह से लगभग पूरी दुनिया लाकडाउन में है और सभी जगह आर्थिक गतिविधियां ठप्प पड़ी हैं। लोगों के रोजगार छिन रहे हैं। वैश्विक मंदी का दौर शुरू होने वाला है। इसमें महिलाओं की स्थिति पुरुषों की तुलना में ज्यादा खराब है। अमरीका में विगत मार्च महीने में ही करीब 10 लाख 40 हजार लोग बेरोजगार हो गए हैं। सन् 1975 के बाद अमरीका में बेरोजगारी का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की नौकरियां ज्यादा गई हैं। भारत में भी महिलाओं के रोजगार की स्थिति पुरुषों की तुलना में ज्यादा चिंताजनक है। वैसे भी पुरुषों को काम के बदले मिलने वाले पगार की तुलना में महिलाओं को भारत में 75 फीसद ही मिलता है जबकि अमरीका में यह 85 एवं आस्ट्रेलिया में 86 फीसद है।
महामारी या किसी भी बड़ी आपदा में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति पर लन्दन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर क्लेयर वेन्हम का अध्ययन बताता है कि लगभग प्रत्येक आपदा में महिलाएं ही ज्यादा परेशानी झेलती हैं। प्रोफेसर वेन्हम ने इसके पहले जीका एवं इबोला महामारी के दौरान भी स्त्री-पुरुषों के हालात पर अध्ययन किया था। उनके अनुसार महामारी की वजह से लाकडाउन या घरों में ही रहने की बाध्यता का खामियाजा महिलाओं को ही ज्यादा उठाना पड़ता है। इस दौरान उन पर यौन ज्यादतियां और यौन हिंसा के ज्यादा मामले होते हैं। उन्हें गर्भपात या गर्भनिरोध का विकल्प भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता मसलन उन्हें अनचाहे गर्भ की स्थिति से गुजरना पड़ता है। महामारी या लाकडाउन के दौरान महिलाएं घरेलू हिंसा का भी सबसे ज्यादा शिकार होती हैं। अर्न्तराष्ट्रीय आकंडा देखें तो फ्रांस में लाकडाउन के पहले ही हफ्ते में घरेलू हिंसा के मामले एक तिहाई बढ़ गए जबकि आस्ट्रेलिया में महिलाओं पर हिंसा के मामले में 75 फीसद की वृद्धि हुई। अमरीका में महिलाओं पर हिंसा का आंकड़ा दो गुना है जबकि भारत में विगत कुछ वर्षों से प्रमाणिक आंकड़े जारी करने ही बन्द कर दिये गए हैं। फिर भी राष्ट्रीय महिला आयोग की वेवसाइट के अनुसार वर्ष 2019 की तुलना में अप्रैल 2020 में विगत एक महीने में घरेलू हिंसा, बलात्कार या बलात्कार की कोशिश, इज्जत से जीने का मामला, यौन हिंसा, यौन प्रताड़ना के मामलों में लगभग, दो गुना से ज्यादा की शिकायतें दर्ज हैं।
कोरोनासंक्रमण काल का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि सरकारी हठधर्मिता, राजनीतिक नेतृत्व के दंभ और कुत्सित महत्वाकांक्षा के कारण लगभग 5 से 8 करोड़ लोगों को बेहद अपमानजनक व कष्टदायी परिस्थितियों में हजारों कि.मी. की यात्रा पैदल तय कर घर लौटना पड़ा। अचानक लॉकडाउन की घोषणा के बाद प्रवासी, श्रमिकों में जीवन और भोजन को लेकर उत्पन्न अनिश्चितता एवं आशंका ने उन्हें अपने गांव लौटने को विवश कर दिया।शहर के स्थापित मध्यवर्ग और सरकारों ने भोजन और किराये के नाम पर जब लूटना शुरू किया तो प्रवासी श्रमिकों को स्पष्ट हो गया कि गांव लौटना ही एकमात्र रास्ता है। फिर तो वे महीनों पैदल चल कर घर लौटने लगे। इसमें महिलाओं और बच्चों की हालत को देखना अपने आप में एक यातना से गुजरना है। सरकार, नेताओं और दलाल पत्रकारों की असहिष्णुता ने अमानवीयता के नये कीर्तिमान स्थापित किये। शासन व्यवस्था की बेशर्मी का आलम यह है कि पैदल घर लौटते महिलाएं, बच्चे व विकलांगों के साथ सरकारी आदेश पर भेदभाव, खाना नहीं देना, कहीं रुकने नहीं देने का पालन पुलिस और अधिकारियों ने किया। तर्क यह कि इन चलते-फिरते ‘‘कोरोना’’ से हमारे लोग न संक्रमित हो जाएं?
कोरोनासंक्रमण और लॉकडाउन ने समपन्न भारतीय समाज, राष्ट्र और हिन्दुत्व की औकात नाप ली है। ‘‘सबसे बड़े लोकतंत्र’’,‘‘सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी’’,‘‘सबसे लोकप्रिय नेता’’,‘‘सबका साथ, सबका विकास’’ जैसे जुमलों की हकीकत खोलकर रख देने वाले इस लम्बे लॉकडाउन ने शहरी मध्यम वर्ग के स्वार्थी चरित्र को भी बेनकाब कर दिया है।मातृशक्ति, सशक्त नारी, जननी जन्मभूमि जैसे शब्दों की चासनी में डूबे कथित हिन्दुत्थान के रामराज्य में औरतों की दुर्दशा ने स्पष्ट कर दिया है कि जुमलों के सहारे सत्ता तक पहुंचने वालों के राजनीति में प्रयुक्त एक-एक शब्द छल, कपट और झूठ के उस पासे की तरह हैं जिसके सहारे केवल लूट की जा सकती है। कोरोना संक्रमण काल में दलित व मुसलिम महिलाओं, आदिवासियों एवं श्रमिक महिलाओं ने जो ऐतिहासिक दुःख झेला है वो तो भुलाया नहीं जा सकता। यह सबक तो महिलाएं शायद ही भूल पाएं कि स्त्रियां पुरुषवादी सत्ता और पुरुष वर्ग के लिये भोग और शोषण का साधन मात्र हैं।

Monday, May 11, 2020

कोरोना संक्रमण का सामाजिक/राजनीतिक पहलू


 चीन के वुहान से जब यह खबर निकली कि कोरोना संक्रमण एक नया खतरनाक वायरस ;ब्व्टप्क्.19द्ध अब बेकाबू हो चला है तब महामारी/जैविक हथियार आदि का खेल खेलने की हैसियत रखने वाले कथित शक्तिशाली देश भी खुद को संभाल नहीं पाए। यह शायद उनका ‘‘ओवर कान्फिडेन्स’’ रहा होगा लेकिन इस वैश्विक सत्ता शीर्ष के पिछलग्गू देशों का नेतृत्व भी मस्त रहा। शायद इस उम्मीद में कि, ‘‘वो हैं न सब संभाल लेंगे।’’इस ओवर कान्फिडेन्स का खामियाजा विश्व शक्ति का घमण्ड पाले ‘‘अमरीका’’ को जितना उठाना पड़ा उससे पूरी दुनिया अचम्भित है। उसके छुटभैये देश की सरकारों का तो वही जानें लेकिन जनता न तो रो पा रही है और न ही खुल कर अपना विरोध दर्ज कर सक रही है। सरकार समर्थित मीडिया कोरोनासंक्रमण से निबटने के लिए सरकार की ऐसी वाहवाही कर रहा है मानो सरकार ने सचमुच ‘‘रामराज’’ स्थापित कर दिया हो। देश की अधिकांश जनता बदहाल, परेशान और गम में है। वह अपने गुस्से को भी प्रकट नहीं कर पा रही। बेहाली, भूख और भविष्य की चिंता में डूबी देश की 70 फीसद से ज्यादा आबादी खौफजदा है और किसी तरह लॉकडाउन के इन्तजार में है।
यह जानना बेहद जरूरी है कि कोरोनासंक्रमण के नाम पर देश में सामाजिक, राजनीतिक स्तर पर क्या क्या खेल हुए और उससे समाज और देश का कितना नुकसान हुआ। इस कोरोनासंक्रमण से हुए आर्थिक नुकसान के अनुमान पर मैं पहले लिख चुका हूं। यहां हम इसके सामाजिक, राजनीतिक पहलू पर चर्चा करेंगे। यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि कोरोनासंक्रमण के दौर में जो राजनीतिक पहलकदमी हुई उसके दूरगामी असर होंगे और इसकी वजह से जो हालात उभरे उसने 70 साल पहले के अराजक असंतोष और प्राध्यापक प्रो. फैसल देव जी ने अंग्रेजी के एक अखबार ‘द हिन्दू’ में लिखे अपने लेख में बताया है कि जब हिंसा का इतिहास आजादी के विचार को अपने साए में ले लेता है तो या तो उसके नाम पर आजादी का बलिदान किया जा सकता है या उसे अधकचरा अथवा पिछड़ा बने रहने दिया जा सकता है। भारत का विभाजन साम्प्रदायिक निष्ठा की शक्ति का प्रदर्शन और उसी की जीत थी क्योंकि इसमें हिन्दू और मुसलमानों ने स्वेच्छा से अपने पड़ोसियों को त्याग दिया था। इस विभाजन में विश्वासघात बेहद अहम था। आज भी हिन्दु-मुसलमान, अमीर-गरीब के बीच विभाजन को सत्ता ने स्पष्ट कर दिया है। किसी भी देश में नागरिकों का पारस्परिक सम्बन्ध न तो प्रेम से परिभाषित होता है और न ही नफरत से।यह परिभाषित होता है उदासीनता ;।चंजीलद्ध से। सांस्कृतिक या धार्मिक एकता की तड़प और विश्वासघातियों का शिकार देश की एकता को महज जोखिम में ही डालेगा।
कोरोनासंक्रमण के प्रसार के रोकथाम के लिए 20 मार्च को प्रधानमंत्री ने एक दिन के लिये ‘‘जनता कर्फ्यू’’ के बहाने ‘‘लॉकडाउन’’ का जायजा ले लिया था। फिर 24 मार्च को अचानक देश के लम्बे समय के लिये ‘‘लॉकडाउन’’ की घोषणा कर दी गई। देश जानता है कि लगभग 30-40 करोड़ लोग देश में रोजगार और अन्य कारणों की वजह से अपने घर, गांव, शहर, प्रदेश, देश से बाहर रहते हैं। उन्हें अपने स्थान पर लौटने के लिये 5-6 दिन तो चाहिए ही था लेकिन महज चार घंटे की मोहलत देकर प्रधानमंत्री ने जो लॉकडाउन घोषित किया उसकी वजह से हजारों लोग विदेशों में फंसे रह गए। करोड़ों लोग देश के विभिन्न हिस्से में ही रोक दिये गये। कुछ लाख मजदूर ‘‘लाकडाउन’’ में जीवन की दुश्वारियों का अन्दाजा लगाकर पैदल ही हजार-डेढ़ हजार कि.मी. का सफर तय कर घर पहुंचने की जिद में निकल लिए। कुछ रास्ते में ही ढेर हो गए तो कुछ बीमार पड़ गए कुछ भूख से मरे तो कुछ ने आत्महत्या कर ली। 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी अपनी सफाई दी की उसने भारत के इस लॉकडाउन के लिए कोई अपील या चेतावनी जारी नहीं की थी।
यह सवाल अभी भी जवाब के इन्तजार में है कि बिना किसी पूर्व तैयारी या विपक्ष से सलाह मशविरा के प्रधानमंत्री को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि अचानक देश में लॉकडाउन करना पड़ा ? आज न तो सशक्त विपक्ष है और न ही जनपक्षीय मजबूत मीडिया जो सरकार से यह पूछ सके कि एक अनाड़ी की तरह उसने लॉकडाउन की जानलेवा घोषणा क्यों की जिसमें सैंकड़ो जानें गईं और लाखों लोग पूरी तरह परेशान हुए। हाँ ‘‘लॉकडाउन’’ के दौरान, मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार गिराकर शिवराज चौहान को सत्ता सौंपना, पश्चिम बंगाल में ममता सरकार पर दबाव बनाना, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की विधानसभा सदस्यता जैसे कई राजनीतिक मामले हैं जिसमें भाजपा को एकतरफा फायदा था और भाजपा ने इस लॉकडाउन में यह फायदा लेने की पूरी कोशिश भी की।सीएस/एनआरसी के खिलाफ देश में चल रहे प्रतिरोध का प्रतीक बने शाहीन बाग के कुछ मुस्लिम चेहरों को कानूनी दांव में फंसा कर जेल में डालने, उ.पू. दिल्ली में हुई हिंसा में बड़े पैमाने पर मुसलमानों को नामजद करने आदि में दिल्ली पुलिस की अतिरिक्त सक्रियता से भी स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार ने अपने ‘‘राजनीतिक मकसद’’ से भी लॉकडाउन का उपयोग किया।
लॉकडाउन का पहला चरण, फिर दूसरा चरण, फिर अब तीसरा चरण अगले हफ्ते समाप्त हो जाएगा लेकिन तब कोरोनासंक्रमण के मामले अपने पूरे शबाब में होंगे और सम्भवतः देश में संक्रमित लोगों का आंकड़ा 1 लाख को पार कर चुका होगा। लगभग 50 दिनों के ‘‘लॉकडाउन’’ के बाद इसे हटाना सरकार की मजबूरी होगी लेकिन तब यह सवाल भी मुखर होगा कि जिस महामारी से नियंत्रण के लिये देश में लॉकडाउन किया गया था वह तो और बड़े पैमने पर फैल गई। तब लॉकडाउन की विफलता पर पहल होगी और लॉकडाउन के दौरान किए गए सरकारी पहलू पर भी चर्चा होगी। इस पूरे दौर में देश की राजनीति में ‘‘कोरोनासंक्रमण बनाम मोदी’’ को ही मीडिया ने फोकस किया मगर हालात ने कुछ और तस्वीरें चेंप दी जैसे प्रवासी मजदूरों की बदहाली, उनके घर वापसी की त्रासदी, कई मजदूरों की घर लौटते मौत, कोरोना संक्रमण के लिए मुसलमानों के तबलीगी जमात को बदनाम करना, इस दौरान इलाज में मुसलमानों से भेदभाव आदि।
लॉकडाउन के दौरान मीडिया ने नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रनायक वाली छवि बनाने की पुरजोर कोशिशें की लेकिन नागरिकों की परेशानियों से जुड़ी कई खबरों ने न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी भारत में अल्पसंख्यकों से हो रहे भेदभाव और उन पर हुए हिंसक हमले को गम्भीरता से लिया मसलन देश की धर्मनिरपेक्षता को गहरा झटका लगा और जनता में सरकार की साम्प्रदायिक छवि ही उजागर हुई। सोशल मीडिया एवं मुख्यधारा की मीडिया के कुछ संस्थाओं ने सरकार पर यह सवाल भी दागे मगर कोई उत्तर नहीं मिला।
लॉकडाउन में कई सरकारी दावे भी कच्चे साबित हुए जैसे प्रभावित लोगों के भोजन, रहने व इन्तजाम के साथ उनके पुनर्वास व घर वापसी के लिए सरकारी पहल। राज्य सरकारों के दावे के बावजूद दूसरे राज्यों या जगहों पर फंसे लोगों को वापस उनके गृह प्रदेश में उनके घर तक लौटने के लिए इन्तजाम में भेदभाव साफ तौर पर दिखा। सम्पन्न मध्यवर्ग के लिए सरकारी इन्तजाम तो थे लेकिन गरीब मजदूरों को सामान्य से भी ज्यादा किराया चुकाकर अपनी जान जोखिम में डालकर लौटने का जोखिम उठाना पड़ा। बड़े पैमाने पर अव्यवस्था फैली और कोरोना संक्रमण का खतरा भी बढ़ा। सबसे ज्यादा तकलीफ मुसलमानों को उठानी पड़ी। उन्हें साम्प्रदायिक नफरत तो झेलनी ही पड़ी, उनके पवित्र रमजान के महीने में उनकी धार्मिक आजादी पर भी लॉकडाउन की बंदिशों का सामना करना पड़ा। इस दौरान सरकार से ज्यादा प्रशासन सक्रिय रहा। पुलिस एवं प्रशासन ने ही देश मेें कोरोना संक्रमण की गम्भीरता का निर्धारण किया मसलन रेड जोन, ओरेन्ज जोन एवं ग्रीन जोन में भी पूरी तरह के सवाल हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया है कि मुख्य मीडिया में भाजपा सहित राज्यों में कोरोनासंक्रमण की स्थिति और गैर भाजपा शासित राज्यों की कोरोनासंक्रमण की स्थिति में राजनीति साफ तौर पर देखी जा सकती है।
लॉकडाउन के दौरान जब कई प्रदेशों में फंसे मजदूरों के समक्ष रोटी और आजीविका का संकट गहराने लगा तो जैसे-तैसे उनके घर लौटने की मांग ने राज्य सरकारों को विवश किया कि वे रेल या बस चलाकर इन मजदूरों के घर वापसी की व्यवस्था करें। कर्नाटक राज्य में मजदूरों के ‘घर वापसी’ के निर्णय पर सरकार वहां के उद्योगपतियों के दबाव में पलटी मारनी पड़ी। ऐसे ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राज्य में अगले तीन वर्ष के लिए श्रम कानून समाप्त कर दिए। उद्योगपतियों के दबाव में योगी आदित्यनाथ ने 38 श्रम नियमों में तीन वर्ष की अस्थाई छूट दे दी। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के एक आदेश में यह भी कहा गया कि लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों का घर वापस लौटना ‘‘लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन’’ है। हालांकि सरकार ने अपील की कि लॉकडाउन की अवधि के दौरान मजदूरों के वेतन भत्ते न काटे जाएं और उन्हें किराये के मकानों में किराए की वजह से बेदखल न किया जाए लेकिन असल में यह एकतरफा ही मजदूर विरोधी दिख रहा है। 
कोरोना संक्रमण के दौरान भारत में जहां लगभग 50 दिनों से ज्यादा का लॉकडाउन भी वायरस के प्रसार को नहीं रोक पाया तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस वायरस संक्रमण से बचने का जो नुस्खा ‘‘लॉकडाउन’’ के रूष्प में सुझाया गया था वह सवालों के घेरे में है? भारत की परिस्थितियां और यहां के लोगों की जीवनशैली में लगभग दो महीने का एकान्तवास कोई परिणाम दिखा पाएगा ऐसा मुझे तो भरोसा नहीं था। मैंने 5 अप्रैल को लिखे अपने लेख में यह स्पष्ट किया था कि कोरोनासंक्रमण से निबटने के लिए ‘‘लॉकडाउन’’ से इतर कुछ दूसरे उपाय सोचे जाने चाहिए मसलन रैपिड टेस्टिंग, प्रभावी सर्विलान्स एवं संक्रमण प्रभावित जगहों पर स्थानीय लॉकडाउन। कई देशों ने ऐसा किया भी। खुद चीन ने उपरोक्त तरीके से ही अपनी अर्थव्यवस्था भी बचाई और बीमारी से भी बढ़ा।
अब तो साफ है कि भारत में लॉकडाउन कोई खास असर नहीं दिखा पाया। हमने अन्तर्राष्ट्रीय तर्कों व नकल के आधार पर अपनी लॉकडाउन योजना बनाई। मसलन हमारा सांप भी न मरा और लाठी भी टूट गई। लॉकडाउन का यहां के उद्योग, व्यापार, मजदूर, कर्मचारी सब पर बुरा प्रभाव पड़ा। एक तरह से देश की अर्थव्यवस्था ही बैठ गई। अभी भी लॉकडाउन-3 के बाद संक्रमण का आंकड़ा तो बढ़ ही रहा है लेकिन मृत्यु दर कम होने की वजह से थोड़ी राहत महसूस की जा सकती है। सरकार को चाहिए कि वह लॉकडाउन की अपनी नीति की समीक्षा करेे और इसमें परिवर्तन लाए। इतना लम्बे समय तक लॉकडाउन देश को गहरे कुंए में ढकेल देगा। ऐसे में देश को भयावह आर्थिक और मानवीय तबाही से बचाना मुश्किल होगा।

Saturday, April 25, 2020

India after COVID-19?


After four months since onslaught of Coronavirus it seems as if the pandemic will start retreating in the next couple of weeks and things will return to normal. During this period the world has gained a collective experience of living under "Lockdown" and learned to cope up with the "police control". I am not undermining the dangers of this new virus rather trying to draw your attention towards the fundamental crisis that is unveiling in the name of this danger.
First let us have a look at the chronology of events in India, the first case of Corona infection was traced in a student who returned from the city of Wuhan in China to his homeland Kerala on January 30, 2020. By the third day of February 2020, a total of three infected cases were found. Come March and we have a thousand cases. On April 2 it doubled up to 2000. Then it touched 3000 in a couple of days and the latest data being 21,403 infected and 681 dead by April 23, 2020.
This period has witnessed a sustained campaign by the media against Tableeghi Jamaat, a religious sect of Muslims that was held responsible of spreading infection. Although 27 infected people were traced Corona positive in a group of Sikhs who had returned from Italy and Germany on March 7th. Likewise 5 people were identified as Corona positive among a foreigner tourist group that visited Tajmahal in Agra on March 5th. The Indian Government has accepted that a total of 15 lakh foreign travelers visited India from January 18 to March 23.
India was locked down on the night of March 24 through an address to the nation by PM Narendra Modi. At that time around 10 Crore people were residing away from home temporarily in different provinces of India. The sudden announcement took them by surprise and they left their dwellings in haste to return home. Around 25 lakh workers left for their homes with families covering 1000 to 1500 kilometers by road on foot. They faced police batons, rains, hunger and fear at the same time but nothing could stop them. This reverse migration reminded the country of the Great Exodus that was witnessed during the partition of India 70 years back. On the way, many were lured and forced back too.

The situation deteriorated when Prime Minister announced extension of lockdown till May 3. People gathered at railway stations in Surat and Mumbai. This undeclared emergency took a toll on 15 Crore migrant workers across the nation. At the same time members of upwardly mobile middle class were lifted in luxury buses by the administration in Gujarat, South India and Uttar Pradesh and taken back home. This was a stark revelation of class privilege shown by the State that has strengthened in last few decades under the neo-liberal regime.
Apart from class difference, communal polarization has also sharpened during the last few years that have instilled a sense of fear amongst Muslims. Minorities and Dalits are being attacked with impunity violating all constitutional norms. This trend has not only continued but intensified in the wake of Corona pandemic. People who got stucked on the way to home are victims of mis-management and are starving. The government announced package of 1.7 lakh crores for Corona but it is of no use to Crores of migrant workers. On the other hand more than 40 Crore farmers and workers are dissatisfied. Their future is gloomy.
Around 94 percent of the workforce is employed in unorganized and informal sector that contributes 45 percent to the GDP. This is the group that has been affected worst during lockdown. People have lost their jobs overnight. Farming is in perpetual crisis. In this agricultural season farm labour is unavailable and transportation locked down that has resulted in the destruction of farm yields. A total 58 percent population is dependent on agriculture and contributes 256 billion dollars in Indian economy. We have no idea what this loss would amount to the economy as a whole.
Some independent data is also available for different sectors. As per Center for Asia-Pacific Aviation (CAPA) estimates, aviation sector will lose 4 billion dollars which would in turn affect tourism and hospitality business. Auto Industry would suffer 2 billion dollars. Experts say that a relief package of at least 10 Lakh Crore is required to be pumped in the Indian economy.
Meanwhile whatever it takes for COVID-19 to subside, it would have changed the lifestyles permanently. People will embrace some changes themselves, rest would be imposed by the state and police. A new vocabulary has emerged altogether like Social Distancing, Quarantine, Isolation, Lockdown, Coronials, etc. Now people will maintain distance and suspect every other. Forget hugging, handshake will become a thing of the past. In this scenario, if the communal forces reign in, then an individual will be identified by his/her religion. Some new products have entered in daily life like sanitizer, mask, gloves, PPE, gun thermometer. Middle class families will now prefer keeping these permanently at home.
Recall 1980's when just after the explosion of HIV/AIDS disposable equipments and condoms became an essential part of medical fraternity. Likewise people will now need to sanities themselves when they go out and come back. Handshake, hugging etc will become a rare sight, forget a kiss of love.

After Corona infection subsides, hospitals will change their priority of diseases. Almost in every hospital we could see a different department for communicable diseases in Emergency and ICU. Medical professional will now give priority to Corona infection over any other disease. Hospitals will have to priorities public health in their list over specialized treatment of diseases like Cancer, Diabetes, Heart Diseases, Gastro, Renal and Mental Diseases. Private Hospitals have started increasing the number of ICU's, ventilators and Isolation wards. Doctors will reorient waiting section of their private clinics. Spitting will be a serious crime now. Thermal scanners will be installed at the entrance points in hospitals and clinics. Waiting halls in OPD are being redesigned to enforce social distancing norms. Many hospitals have started discrimination on religious lines. And most probably a visiting patient would be needed to declare whether he has not returned from a foreign trip in recent times.
This is the first time when we see a centralized and strengthened role of state and police during an epidemic. After the lockdown was enforced, we came to know that the right to privacy and related civic provisions hold no more in front of Epidemic Act, 1897. Right to Privacy is given under Article 21 of Indian Constitution and part of fundamental rights under Section 3 that says no one could be deprived of right over his/her body under the statutes of established law. Although Article 352 of the constitution equips the President under Articles 358 and 359 to suspend fundamental rights in a situation of national emergency but rights provided under Articles 21 and 23 cannot be revoked in any case. Today we see clearly that a majoritarian government with the help of its police is ready to violate all these rights just under Epidemic Act 1897.
In the world after Corona we will see that the government in power would resort to ambiguous and one sided decisions without giving a shit to the opposition or democratic process. The fundamental functioning of government will change and so the relation with its citizens. Most of the education and jobs will go online. Your data on mobile and computers would be under direct surveillance. Resistance of peoples' organizations for civic rights would be termed as anti-national and middle class will support it. Non-aligned movements and regional co-operation will give way to a more centralized global system. Powers of the provinces will shrink altogether and centralized nationalist politics would flourish under the garb of democracy. Democracy would shrink further.
During a pandemic, people are required to follow a certain set of rules. For this government keeps a watch over peoples' activities and punishes those who violate orders. This surveillance will be enforced through UID, mobile number and data. CCTV cameras installed in the community will keep a 24 X 7 watch over citizens and government may catch anyone on its whims and fancies. You will be forced to obey the power through police. Questioning the current day government will become tougher. The most powerful few will govern this world and every government will be most powerful in its own territory. Democracy will no more remain "government by the people, for the people and of the people". This will transform into "of the government and for the people". Opposition will become redundant under this new definition.
The million dollar question is: Are we ready for the new regime?



Tuesday, April 21, 2020

Panacea for the Coronavirus will come from Homoeopathy




It is not only relevant but equally pertinent and important to be reminded of Homeopathy in these times of global crisis that has arisen out of COVID-19 pandemic. Those interested in the history of medical sciences may refer to the Journal of History of Medicine and Allied Sciences issue of 1997 that carries a couple of research papers. These papers mention about the situation in 1832 when the pandemic named Asiatic cholera was at its peak in Europe. Thousands of people were suffering due to the shortage of medicines. According to these papers, modern medical science or Allopath could not fulfill these requirements and it was almost a failure. It was the time when around 20 to 50 lakh people in Europe were dying every year. The epidemic attacked the city of London consecutively in rounds between 1848 and 1854. Lakhs of people suffered and thousands died but no one could find the reason behind this. Major Allopath specialists attributed the spread of Cholera to air pollution but they could not find a way out.
When the epidemic recurred in 1854 then only for the first time it could be known that Cholera does not spread due to air but it has its roots in polluted water. It took much effort for the renowned health scientist Dr. John Snow to establish that Cholera spread from polluted water, not air. After that, ruler of Britain King George VI had to take services from the medicos of Royal London Homeopathic Hospital to cure Cholera patients. Thus thousands of people were saved from dying.
Today after one and half century later when this world confronts the pandemic caused due to Corona virus, again we have no clarity over its treatment and the desired medicine. It is unfortunate that governments have not even tried and initiated anything towards Homeopathy at any level. In this scenario many Homeopathic medicos who are engaged in research and studies at personal level are unable to officially serve the struggling patients. Almost the whole world is in lockdown due to infections afflicted by Coronavirus. In India, as per Epidemic Rules 1897, no medical practitioner from any other branch of medicine other than Allopath can treat patients without taking the permission from Central Government.
Here it is important to know that in 1958 when the Cholera struck Orissa, a Homeopathy practitioner was booked under the same Epidemic Rules 1897 and punished under Section 188(3) of Indian Penal Code just because he had refused to consume Cholera vaccine himself. He preferred Homeopathy medication over the vaccine and he remained safe too, although got punished by law.
There are numerous evidences of the relevance of Homeopathy during pandemic but just due to legal barriers and laws, Homeopathy could not be put into service of people due to which they are left to die on their own.
It is widely known that Allopath has its own constraints and limitations in the context of diseases and epidemics. Despite it does not give space to Homeopathy and other alternative medicine systems. This owes to the pressure created by its all-powerful Pharma lobby. The most telling example is that of the world power US that has helplessly surrendered in front of COVID-19. It is appealing the world to save its citizens. The way in which US has intimidated India for exporting Hudroxychloroquineotherwise face retaliation shows its desperation and sorry state of affairs. It is an altogether different story that the medicine asked by US for export is a suspicious treatment for Malaria because USFDA has not sought it fit. Despite the way US administration is pleading and intimidating the world for this medicine itself proves the case.
It is said that every crisis puts to test each and every possibility for hope. Corona virus has spread in a total 209 countries including US and Europe. China and other countries are testing alternative ways of treatment but here in India, our Government does not rely on Homeopathy despite it being an official mode of treatment.
I have personally treated a couple of UK citizens who were Corona positive and they are safe now. One of my acquaintances in Britain had called me up asking for Corona treatment. I assisted them regularly through Homeopathy over internet. Not only they but another couple of patients in the same family got relief from my line of treatment. They were much scared of being treated in a hospital so they wanted to be treated at home. This success case is on the record.
My good friend and world renowned Homeopathy practitioner Dr. Rajan Sankaran has forwarded to me more than a hundred successful evidences of treatment of Corona positive patients via Dr. Aditya Kasarian of Iran and Dr. Masimo Mangiyalavori  of Italy. Despite several efforts here, we could not get official green signal for curing Corona positive patients in Delhi. Health Minister in Delhi Government Mr. Satyendra Jain took personal interest in our efforts but Indian Council of Medical Research (ICMR) has shown least interest in our proposal.
It is obvious that following WHO guidelines in a pandemic scenario is a must for all but then giving an opportunity to a micro-science like Homeopathy that has no side effects may help the government to take a big step in averting large scale loss. As a Homeopathy practitioner and researcher, I sincerely hope that results will be positive.
It has been more than three decades since I am writing continuously on the usefulness of Homeopathy. In hundreds of my articles published till date I have tried to communicate that each and every science has ample of possibilities. We just need to put them to work and harness their power. Homeopathy works very smoothly. Where Allopath fails, Homeopathy may be a better option. Many diseases that were assumed to be extinct and made a surprise comeback were successfully cured by Homeopathic medicines. We can cure the fear and panic of infectious diseases such as Bird Flu, SARS and Swine Flu by Homeopathy. Homeopathy has the real capacity to confront challenges posed to Public Health but this power and possibility needs to be harnessed too.
If we could sincerely go through the space-time similarities between research works of Dr. Samuel Hahnemann (Father of Homeopathy), Edward Jenner (British physician who discovered small-pox vaccine) and French Microbiologist Louis Pasteur, we may come to the conclusion that after 170 years Corona has led this world into the same situation. Humanity is again in crisis. This requires a larger solidarity among all humanitarian physicians, medicine systems and medical organizations to come forward free of their prejudice and search for a "Panacea" through integrated medicine systems. World will welcome their move if they do so. This is a golden opportunity amidst global crisis.
Controlling infections due to Corona is far away and not coming to us soon. This virus cannot be killed by anti-virus. It's nature and composition makes it so. These viruses will go on amassing immunity to every newest anti-virus discovered. This battle between virus and humanity may take a pause for some time but we cannot sit back assuming that we have won the battle by medicines and vaccines. Recall Spanish Flu that spread during 1918-19 and engulfed five to seven Crore people around the world. This Corona Virus is a member of the same family albeit much powerful. So we need to think this time ahead of killing this virus. Killing theory will not work this time.
Today we need a human being that has strong immunity against these viruses. US Microbiology Academy has also approved of the fact that viruses are much powerful to evolve on their own and they will transform and recreate themselves continuously for ever failing man-made medicines. Precisely for this reason we need to find out an entirely new way to confront them. Nowadays these viruses have become such exaggerations that people take their name as if they refer to a terrorist outfit. Advertisements portray these viruses as deadly enemy so as to create a market for costly chemicals. All this is happening in case of Corona too. We need a new thought process to save our people from the deadly effect of viruses. The million dollar question is: Are we ready for a healthy discussion and debate on viruses, their effects, diseases and modes of treatment?

Monday, April 20, 2020

कोरोनावायरस संक्रमण के बाद का भारत



दुनिया के सामने कोरोनावायरस संक्रमण का अब तक चार महीने का अनुभव सामने है। उपलब्ध जानकारियाँ और विभिन्न देशों की गतिविधियां बता रही हैं कि अगले दो या तीन हफ्ते में देश और दुनिया का कार्यकलाप धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगेगा। इस दौरान पूरी दुनिया ने जो चीज एक साथ झेली है वह है ‘‘लॉकडाउनऔर जो सीखी है वह है ‘‘पुलिस के नियंत्रणमें रहना। मैं कोरोनावायरस के संकट को कमतर नहीं आंक रहा लेकिन इस संकट के नाम पर उत्पन्न खतरे की ओर आपका ध्यान खींचना चाह रहा हूँ। मैं अपनी बात भारत के सन्दर्भ में रखूंगा लेकिन दुनिया में जो ‘‘कोरोनावायरस संक्रमण कालका परिदृश्य है उस पर भी आपका ध्यान आकृष्ट करूंगा।
भारत में कोरोनावायरस का प्रवेश
भारत ने 30 जनवरी 2020 को कोरोनावायरस संक्रमण का पहला मामला चीन के वुहान से लौटे भारतीय छात्र में पाया गया। यह छात्र केरल का रहने वाला था। 3 फरवरी तक संक्रमित लोगों की संख्या तीन हो गई थी। मार्च आते आते कोरोनावायरस संक्रमित लोग भारत में 1000 तक पहुंच गए। 2 अप्रैल को यह संख्या 2000 को पार कर गई। 4 अप्रैल तक 3000 और 19 अप्रैल को 15,712 संक्रमण और 507 मौतें दर्ज हो गई थीं। इस बीच देश में सत्ता की राह पर साम्प्रदायिक सोच वाली मीडिया ने यह समाचार चलाया कि भारत में कोरोनावायरस संक्रमण मुसलमानों के तबलीगी जमात से फैल रहा है। हालांकि इससे पहले 7 मार्च को इटली और जर्मनी से लौटे सिख समुदाय के एक धार्मिक समूह के 27 लोग कोरोनावायरस पॉजिटिव पाए गए थे। ऐसे ही 5 मार्च को आगरा में ताजमहल देखने आए विदेशियों में से 5 लोग कोरोना संक्रमित थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 18 जनवरी से 23 मार्च तक विदेशों से 15 लाख यात्री भारत आए।
देश में लॉकडाउन
24 मार्च 2020 को रात्रि 8.00 बजे ‘‘राष्ट्र के नाम सम्बोधनके बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में 21 दिनों के लॉकडाउन की जब घोषणा की थी तब लगभग 10 करोड़ लोग देश में विभिन्न राज्यों में अस्थाई रूप से रह रहे थे। ये लोग अचानक इतनी लम्बी तालाबन्दी से आशंकित हो गए और येन-केन-प्रकारेण अपने घर लौट जाने के लिये तत्पर हो गए। अफरा-तफरी में में कोई्र 25 लाख मजदूर तो अपने छोटे बच्चे, पत्नी और सामान के साथ 1000,1500 कि.मी. लम्बी यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े। पुलिस के डण्डे, बारिश, भूख और डर के साथ देश के लगभग सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर मजबूर मजदूरों का काफिला 71 वर्ष पूर्व बंटवारे के विस्थापन की याद दिला गया। काफी लोग जहां थे वहीं अटक गए। पुलिस का खौफ और राज्य सरकारों के दिलासा के झांसे में उन्हें रुकना पड़ा। कोई और चारा भी नहीं था। स्थिति तब और विस्फोटक हो गई जब प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन को बढ़ाकर 3 मई तक कर दिया। सूरत, मुम्बई में लोग रेलवे स्टेशन पर जमा हो गए। बिना किसी पूर्व तैयारी के घोषित इस ‘‘तात्कालिक इमरजेन्सीका देश के 15 करोड़ प्रवासियों, मजदूर और लोगों पर बहुत बुरा असर पड़ा। इस बीच गुजरात, दक्षिण भारत और उत्तर प्रदेश के सम्पन्न मध्यवर्ग को लग्जरी बसों में भरकर पुलिस की निगरानी में उनके गणतव्य तक पहुंचाया भी गया। लॉकडाउन में विदेशी सैलानियों के इण्डिया गेट पर भ्रमण की भी खबरें हैं। प्राचीन भारत में जैसे वर्ण व्यवस्था मजबूत थी वैसे ही अब यहां वर्ग व्यवस्था जड़ जमा रही है। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण ने अमीरी और गरीबी के बीच खाई को बहुत बढ़ा दिया है। विगत कुछ वर्षों में यहाँ साम्प्रदायिक धु्रवीकरण के तेज होने से एक सम्प्रदाय विशेष (मुस्लिमों) में असुरक्षा एवं आक्रोश काफी बढ़ा है। संविधान की धज्जियां उड़ाकर गरीब मुसलमानों एवं दलितों पर दबंगों के हमले बढ़े हैं और हमलावरों को राजनीतिक संरक्षण मिलने से समाज में कटुता और अविश्वास भी गहराया है। देश में लॉकडाउन और कोरोनावायरस संक्रमण के सन्दर्भ में भी साम्प्रदायिक विद्वेष, गरीबों की उपेक्षा और उन पर पुलिसिया जुल्म तथा सरकारी लापरवाही बड़े पैमाने पर देखा गया है। अब भी जो लोग अपने घर नहीं पहुंच सके और जहां भी फंसे हुए हैं वे सरकारी कुव्यवस्था के शिकार हैं और भूख, अभाव तथा अव्यवस्था में जीने को मजबूर हैं। लॉकडाउन के सरकारी पैकेज में 1.70 लाख करोड़ रुपये में 10 फीसद भी इन बहुसंख्यक गरीब मजदूरों के लिए नहीं हैं। सरकार के रवैये और अब तक की घोषणा से देश का लगभग 40 करोड़ श्रमिक, किसान संतुष्ट नहीं है। उसे आगे की जिन्दगी का अंधेरा परेशान कर रहा है।
लॉकडाउन के साइड इफेक्ट
भारत में असंगठित क्षेत्र देश की करीब 94 फीसद आबादी को रोजगार देता है और देश की अर्थव्यवस्था में इसका 45 फीसद योगदान है। लॉकडाउन की वजह से असंगठित क्षेत्र पर बुरी मार पड़ी है। रातों रात लाखों लोगों के रोजगार छिन गए हैैं। खेती किसानी की स्थिति भी अच्छी नहीं हैं। यह समय खेती के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण है। नई फसल तैयार है लेकिन खेतों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। माल की ढुलाई बन्द होने से अनाज और कृषि उपज काफी बरबाद हो रही है। भारत की कुल आबादी का 58 फीसद हिस्सा खेती पर निर्भर है और देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का 256 बिलियन डालर का योगदान है। यह अन्दाजा नहीं लगाया जा रहा है कि मौजूदा हालात में अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान होगा? कुछ और अलग-अलग सेक्टर के अध्ययन भी आए हैं। जैसे सेन्टर फॉर एशिया पैसिफिक एविएसन (सीएपीए) के अनुमान के अनुसार एविएशन इन्डस्ट्रीज को करीब 4 अरब डालर का नुकसान झेलना पड़ेगा। इसका असर टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी उद्योग पर भी पड़ेगा।ऑटो इण्डस्ट्री में करीब 2 अरब डालर के नुकसान का अनुमान है। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कोरोनावायरस संक्रमण एवं लॉकडाउन से प्रभावित भारतीय अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए कम से कम 10 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की जरूरत है।
कोरोनावायरस संक्रमण ने बदली जीवनशैली
कुछ महीने या साल जो भी लगे कोरोनावायरस संक्रमण तो थम ही जाएगा लेकिन यह लोगों के जीवन जीने के तरीके को बदल चुका होगा। कुछ आदतें तो लोग खुद अपना लेंगे और कुछ सरकार और पुलिस समझा देगी। समाज में कुछ शब्द प्रचलन में भी गए हैं। जैसे सोशल डिस्टेन्सिंग, क्वारेनटाइन, आइसोलेशन, लॉकडाउन, कोरोमियल्स आदि। जाहिर है अब लोगों को आपस में फासला रखना होगा, हर दूसरे पर शक करना होगा ? गले मिलना तो दूर हाथ मिलाने में भी परहेज करना पड़ेगा ? यदि साम्प्रदायिक समूहों का वर्चस्व रहा तो व्यक्ति इन्सान कम हिन्दू-मुसलनमान के रूप में ही पहचाना जाएगा। लोगों के रोजमर्रा के जीवन में जिन नए उत्पादों का महत्व बढ़ गया है उनमें सेनिटाइजर, मास्क, ग्लब्स (दस्ताने), पर्सनल प्रोटेक्शन किट (पीपीई), गन थर्मामीटर आदि अब हर मध्यवर्गीय परिवार में आवश्यक रूप से रखे जाने लगेंगे। याद कीजिए दुनिया में एचआईवी/एड्स संक्रमण के स्थापित होते ही (सन् 1980 के बाद) चिकित्सा में डिस्पोजेबल उपकरण, कोन्डोम आदि जीवन के आवश्यक अंग बन गए हैैं। ऐसे ही अब जब आप कहीं जाएंगे तो आपको अपना हाथ और शरीर सेनेटाइज करना होगा। शायद आप हाथ मिला पाएं, गले मिल सकें और प्यार का चुम्बन तो आपके लिए मुश्किल ही हो जाए।

बदली रोगों की प्राथमिकताएं
कोरोनावायरस संक्रमण के इस भयावह दौर में अस्पतालों में रोगों और मरीजों की प्राथमिकताएं बदल जाएंगी। आकस्मिक एवं गहन चिकित्सा विभाग में संक्रामक रोगों का विभाग अलग से लगभग सभी अस्पतालों में बनाया जाएगा। चिकित्सक अब कोरोना संक्रमण को अन्य रोगों की तुलना में ज्यादा अहमियत दिया करेंगे। अस्पतालों के अपने रोग और उपचार की व्यवस्था में जन स्वास्थ्य को ज्यादा महत्व देना होगा। कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, पेट के रोग, किडनी, लीवर के लोग, मानसिक रोग आदि से भी ज्यादा अब कोरोनावायरस संक्रमण वायरस संक्रमण को अहमियत दी जाएगी। सभी निजी और सरकारी अस्पताल अब अपने यहां ज्यादा से ज्यादा वेंटिलेटर, आईसीयू, आइसोलेशन वार्ड आदि की व्यवस्था में लग गए हैं। चिकित्सकों के निजी क्लीनिक भी मरीजों के बैठने की जगह को बदला जाना जरूरी होगा। मरीजों को मास्क पहनना लगभग अनिवार्य कर दिया जाएगा। कहीं भी थूकना गम्भीर अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता है। क्लीनिक या अस्पतालों में प्रवेश द्वार पर ही थर्मल स्कैनर लगाए जाएगें। विशेषज्ञों के चयन की प्राथमिकता बदल जाएगी।देखा जा रहा है कि इमरजेंसी मेडिसीन एवं महामारी विशेषज्ञों का महत्व अचानक बढ़ गया है। अस्पतालों क्लीनिक के बाह्य मरीज विभाग (ओपीडी) का प्रतीक्षा कक्ष नए रूप में तैयार किया जा रहा है ताकि मरीज आपस में पर्याप्त दूरी सुनिश्चित कर सकें ? कई शहरों के अस्पतालों में मरीजों के बैठने और बिस्तरे की व्यवस्था में साम्प्रदायिक विभाजन को अहमियत दिया जा रहा है। अब आप जब भी अस्पताल या चिकित्सक के पास परामर्श के लिए जांगे तो सम्भवतः आपको यह घोषणा पत्र भरना होगा कि आप हाल-फिलहाल में कहीं विदेश यात्रा से तो नहीं लौटे ?
महामारी अधिनियम 1897
कोरोनावायरस संक्रमण की वजह से देश में लॉकडाउन की पृष्ठभूमि में जिस अहम कानून/अधिनियम की मुख्य भूमिका है वह है महामारी अधिनियम 1897123 वर्ष पुराना यह अधिनियम पहली बार अंग्रेजों के जमाने में लागू किया गया था। जब पूर्व बम्बई स्टेट में उसी वर्ष बूबोनिक प्लेग ने महामारी का रूप लिया था। इस अधिनियम की केवल चार धाराएं हैं और इसका उपयोग तब किया जाता है जब राज्य या देश पर कोई बड़ा संकट आने वाला हो या कोई खतरनाक बीमारी/महामारी देश में प्रवेश कर चुकी हो। कोरोनावायरस संक्रमण (कोविड-19) से निबटने के लिए केन्द्र सरकार ने इस अधिनियम की धारा 2 को लागू करने का निर्देश राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को दिया है। इस अधिनियम की धारा 2 मेंलॉकडाउन’, लागू करने, लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों पर आईपीसी की धारा 188 के तहत सजा देने का प्रावधान है। इस अधिनियम के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह (जो महामारी से ग्रस्त हैं) को किसी अस्पताल या अस्थाई आवास में रख सके। इसी अधिनियम में सरकारी आदेश नहीं मानने वाले व्यक्ति को 6 माह तक के कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है। इस अधिनियम में सरकारी कर्मचारी एवं पुलिस को कार्यपालन के लिए कानूनी सुरक्षा का भी प्रावधान है। यह अधिनियम 1897 के अलावा, 1959 में उड़ीसा के पुरी जिले में तथा 2009 के पूणे में, 2015 में चण्डीगढ़ में, 2018 में गुजरात के वडोदरा जिले में लगाया जा चुका है। इन दिनों पूरे देश में यह अधिनियम 3 मई तक (फिलहाल) लागू हो चुका है।
कोरोनावायरस संक्रमण काल की परिस्थितियाँ
 कोरोनावायरस संक्रमण ने रोग और महामारी के प्रति मानवीय समाज को नए रूप में जीने को बाध्य कर दिया है। अब तक किसी भी घातक महामारी या बीमारी के फैलने पर राज्य और पुलिस की इतनी केन्द्रित और सशक्त भूमिका आम लोगों ने नहीं देखी थी।
अभी पहली बार जब पूरे देश में वैश्विक महामारी कोरोनावायरस संक्रमण की वजह सेलॉकडाउनको कड़ाई से लागू किया गया तो पता चला कि नागरिकों के निजता के कानूनी प्रावधान इस महामारी अधिनियम 1897 के सामने बौने हैं। निजका अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार का मूलभूत हिस्सा है। यह संविधान के भाग 3 के तहत प्रदत्त आजादी का ही हिस्सा है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और शरीर की स्वतंत्रता अधिकार से वंचित नहीं किया जा सका। हालांकि संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 358, 359 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह मौलिक अधिकार का निलम्बन कर दे लेकिन अनुच्छेद 20 और 21 में दिए गए अधिकार किसी भी दशा में वापस नहीं लिये जा सके। आज महामारी अधिनियम 1897 तथा बहुमत प्राप्त केन्द्र सरकार की गतिविधियों की समीक्षा करें तो स्पष्ट दिखेगा कि सरकार पुलिस की मदद से देश में कोई भी कड़ा कदम भी उठा सकती है?
कोरोनावायरस संक्रमण के बाद का भारत
 कोरोनावायरस संक्रमण के कम होते ही दुनिया धीरे धीरे चलने लगेगी। इस बीच सरकार द्वारा उठाए गए बहुत से तात्कालिक कदम लोगों की जिन्दगी का हिस्सा बन जाएंगे। सत्ता में काबिज सरकार अपने मन मुताबिक निर्णय तेजी से लेगी बगैर विपक्ष या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परवाह किये। लोगों और सरकार के काम करने के तरीके बदल जाएंगे। ज्यादातर स्कूल, कॉलेज और नौकरियांऑन लाइन’ हो जाएंगी। मोबाइल, कम्प्यूटर के आपके डाटा सरकारी सर्विलांश पर होंगे। नागरिक अधिकारों के लिये जन संगठनों का सामूहिक लोकतांत्रिक प्रतिरोध राष्ट्र विरोधी ठहरा दिये जाएगा जिसे अधिकांश सम्पन्न मध्यवर्ग और पूंजीपतियों का समर्थन होगा। गुट निरपेक्ष देशों, क्षेत्रीय सहयोग की जगह एकीकृत वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने का पूरा प्रयास होगा। राज्यों की शक्तियां घटा दी जाएंगी और लोकतंत्र के नाम पर कथित राष्ट्रवादी एकीकृत राजनीति और मजबूत होगी। लोकतंत्र का दायरा सिमटेगा। वैश्विक महामारी (पान्डेमिक) के दौर में सभी व्यक्तियों को कुछ नियामों का पूरी तरह पालन करना होता है। इसके लिये सरकार लोगों की निगरानी करती है और नियम तोड़ने वाले को दण्ड देती है। इसके लिये आपके आधार नम्बर, मोबाइल नम्बर एवं कम्प्यूटर डाटा अहम भूमिका निभाएंगे। आपके इर्द-गिर्द लगे कैमरे आपकी बराबर निगरानी करेंगे और तकनीक के सहारे सरकार जब चाहेगी आपको पकड़ लेगी और उनके नियंत्रण के जो भी उपाय किये हैं वह जल्द खत्म नहीं होंगे और आप पुलिस के माध्यम से सरकार के हर अच्छे-बुरे आदेश को मानने के लिये बाध्य किए जाएंगे। अब सरकार से सवाल पूछने की गुंजाइश भी बहुत कम रह जाएगी। वैश्विक स्तर पर सत्ता का नियंत्रण सबसे ज्यादा ताकतवर देश के पास होगा और राष्ट्रीय स्तर पर आपकी सरकार शक्तिशाली होगी। लोकतंत्र की परिभाषा अब ‘‘जनता का जनता के द्वारा जनता के लिये शासन की बजाय ‘‘जनता के लिये सरकार का शासनहोगा जिसमें विपक्ष लगभग मौन होगा। तो आप तैयार हैं इस नई शासन व्यवस्था के लिये ?

कोरोनासंक्रमण काल में महिलाएं

 कोरोनासंक्रमण के इस विकट काल में भी जहां कुछ बड़े देशों के बड़बोले राजनेता अपनी जनता को उसके भाग्य भरोसे छोड़कर अपनी ब्राडिंग में ही व्यस्...